शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

*५. परचा कौ अंग ~ ३०५/३०८*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ ३०५/३०८*
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रहता९ की सब जागि है, जे रसना गावै रांम ।
कहि जगजीवन विषै दिस, वहिता१० कूं नहीं ठांम ॥३०५॥
(९. रहता- वर्तमान) (१०. वहिता-नाशवान्)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो स्थित है परमात्मा उसे सारा संसार जानता है । और उसी का गुणानुवाद जिह्वा करती है । संत कहते हैं कि जो जन विषयों में रहते हैं उन प्रवाह मय अस्थिर जन को कोइ नहीं जानता ।
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रहता की सब जागि है, उत्तम उत्तम ठांम ।
कहि जगजीवन सुंनि घर, सहज पिछांणै रांम ॥३०६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि स्थिर को सारा संसार जानता है सभी उतम स्थान पर वह मिलता भी है और शून्य स्थान जो स्तुति निंदा से परे है वहां वह राम सहज ही पहचाना जाता है ।
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पंच तत्त के पंच रस, पंचै पंच सुभाव ।
कहि जगजीवन प्रीति स्यूं, पिवै प्रेम घर आव ॥३०७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि यह शरीर पांच त्तत्व से बना है जिसमें से पांचों रस से पांच प्रकृति प्रकट होती है उन सब का पान प्रेम पूर्वक करें ।
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अंतरगति हरि नांव ले, चित्त मंहि अंतरि विचार ।
कहि जगजीवन तहां मन, सब अंग देखै सार१ ॥३०८॥
(१. सार-सार्थक)
संतजगजीवन जी कहते हैं हरि का स्मरण करे व चित में हरि का ही ध्यान करें । संत कहते हैं कि जहाँ मन रमता है वह ही सारयुक्त लगता है अन्य सब व्यर्थ ।
(क्रमशः)

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