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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*७. हैरान कौ अंग ~ २५/२८*
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कहि जगजीवन ए अचम्भौ४, एक बस्तु के मांहि ।
उपज्या मांहीं रमि रह्या, जे हरि उपज्या नांहि ॥२५॥
(४. अचम्भौ - आश्चर्य)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि आश्चर्य है कि एक परम सत्ता ऐसी है जो जिसे उत्पन्न करते हैं उसी में निवास करते हैं । और वे हरि जो कभी जन्मे ही नहीं वे सब में रम रहे हैं ।
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उपज्या नहिं उपज्या कहै, आया नहीं कहै आइ ।
कहि जगजीवन गया नहीं, सो निहचल नहिं जाइ ॥२६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो सदा है उसे उत्पन्न हुआ व जो विद्यमान है उसे आया कहते हैं । परमात्मा सदा सर्वदा हैं अतः वे निश्चल हैं ।
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आदि अंत मधि अलख का, जांणै अलख अगाध ।
कहि जगजीवन रांम रटि, प्रेम पिवै नित साध ॥२७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि आरम्भ मध्य व अंत की स्थिति प्रभु ही जानते हैं । संत कहते हैं कि राम रट कर साधु जन इसी प्रकार प्रेमामृत पान करते हैं ।
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अबिगत अलख अगाध है, आपै आप अनंत ।
कहि जगजीवन अलफ घर, इलाम न पावा अंत ॥२८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु सहज मे न जाने जा सकने वाले हैं, गहन हैं, अदृश्य हैं, और अनंत हैं । संत कहते हैं कि मात्र अक्षर ज्ञान ही विद्या नहीं है विधि पूर्वक जाना गया ज्ञान ही विद्या है ।
(क्रमशः)

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