मंगलवार, 22 सितंबर 2020

*(“चतुर्थोल्लास” ४९/५१)*

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
*(“चतुर्थोल्लास” ४९/५१)*
*शरण लीये की रक्ष्या कीजै,* 
*रक्ष्या करे करष जो बीजै ।* 
*अभ्यागत कोई निरास न जाई,* 
*उति बसता सु रहे सुखदाई ॥४९॥* 
जो आपकी शरण में आये उसकी तन मन धन से रक्षा करनी चाहिये । जिस प्रकार किसान अपने बीज की फसल की सब प्रकार से रक्षा करता है । अतिथि कोई भी निराश न लोटे उसको वहीं निवास, भोजन, पानी देकर सुखी करना चाहिये ॥४९॥ 
*सोई नृप करे प्रतिपालू,* 
*तेजवान है लेई न मालू ।* 
*रोगी रोग रहे नहीं कोई,* 
*खोजी खोज चूंकि नही जाई ॥५०॥* 
वही राजा प्रजा का पालन करने में समर्थ है जो प्रतापवान व वीर है एवं जनता से लगान वसूल नहीं करता है । प्रजा में किसी प्रकार के रोग न रहें और खोजी आदमी माल तलाश करने में किसी प्रकार की लापरवाही एवं चूंक न करे ॥५०॥ 
*हीरा की परख जोहरी जाने* 
*सो सराम जो परख ही जाने,* 
*तीरनदांज जु चोट नीसानै ।* 
*सो सतगुरु जो रांम मिलावै,* 
*इहि साखी जो वेद सुनावे ॥५१॥* 
वही सर्राम जौहरी उत्तम है जो रत्नों व स्वर्ण आदि के परीक्षण में चतुर है । वही तीरंदाज श्रेष्ठ है जिसका निशाना लक्ष्य पर लगता है । सतगुरु वही श्रेष्ठ है जो जीवात्मा को परमात्मा से मिला देता है वही साक्षी है जो वेदों की ज्ञान चर्चा सुनाते हैं ॥५१॥ 
(क्रमशः)

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