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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थोल्लास” ४९/५१)*
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*शरण लीये की रक्ष्या कीजै,*
*रक्ष्या करे करष जो बीजै ।*
*अभ्यागत कोई निरास न जाई,*
*उति बसता सु रहे सुखदाई ॥४९॥*
जो आपकी शरण में आये उसकी तन मन धन से रक्षा करनी चाहिये । जिस प्रकार किसान अपने बीज की फसल की सब प्रकार से रक्षा करता है । अतिथि कोई भी निराश न लोटे उसको वहीं निवास, भोजन, पानी देकर सुखी करना चाहिये ॥४९॥
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*सोई नृप करे प्रतिपालू,*
*तेजवान है लेई न मालू ।*
*रोगी रोग रहे नहीं कोई,*
*खोजी खोज चूंकि नही जाई ॥५०॥*
वही राजा प्रजा का पालन करने में समर्थ है जो प्रतापवान व वीर है एवं जनता से लगान वसूल नहीं करता है । प्रजा में किसी प्रकार के रोग न रहें और खोजी आदमी माल तलाश करने में किसी प्रकार की लापरवाही एवं चूंक न करे ॥५०॥
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*हीरा की परख जोहरी जाने*
*सो सराम जो परख ही जाने,*
*तीरनदांज जु चोट नीसानै ।*
*सो सतगुरु जो रांम मिलावै,*
*इहि साखी जो वेद सुनावे ॥५१॥*
वही सर्राम जौहरी उत्तम है जो रत्नों व स्वर्ण आदि के परीक्षण में चतुर है । वही तीरंदाज श्रेष्ठ है जिसका निशाना लक्ष्य पर लगता है । सतगुरु वही श्रेष्ठ है जो जीवात्मा को परमात्मा से मिला देता है वही साक्षी है जो वेदों की ज्ञान चर्चा सुनाते हैं ॥५१॥
(क्रमशः)

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