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*साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु का दे संग ।*
*दादू परलै राखिले, निगुणा न पलटै अंग ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*कृतघ्नी निगुणा का अंग १२४*
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भस्मासुर भस्मी हुआ, महादेव गुण मेटि ।
तो रज्जब गुण चोर का, भला न होई नेटि१ ॥५॥
गुण चोर का भला नहीं होता, अन्त१ में नष्ट ही होता है । देखो, भस्मासुर ने महदेवजी का उपकार रूप गुण न मानकर उलटा महादेवजी को ही भस्म करना चाहा तब आप ही भस्म हो गया ।
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रज्जब सांई सूर सम, सदगुरु सलित सु अंग१ ।
शिष सफरी२ जन जल जुदे, दादों पोते भंग ॥६॥
ईश्वर सूर्य के समान है और सदगुरु जल रूप१ है शिष्य मच्छी२ के समान है, सूर्य से जल बरसता है और उसमें मच्छी जन्मती है किंतु जल से जुदा हो जाय तो अपने दादा सूर्य से ही मीन रूप पोते नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही ईश्वर से सदगुरु के आश्रय शिष्य रहते हैं किन्तु, शिष्य जन सदगुरु से अलग हो जांय अर्थात गुरुदेव का उपकार नहीं माने तब वे पोते अपने दादा ईश्वर के द्वारा नष्ट होते हैं ।
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देखे मुकर१ मसंद२ मुनि, मुख सुख पावक पीठि ।
रज्जब रवि रमता रची, दया दुष्ट विधि दीठि३ ॥७॥
देखो, आतिशि शीशा१ और मसनद२ का आश्रय लेकर बैठने वाले मुनि का मुख तो सुखद है अर्थात दोनों देखने३ में अच्छे लगते हैं किंतु दोनों के पीठ में अग्नि है । सूर्य ने अपनी किरण से शीशे में और रमता राम ने संत में दया और दुष्टता दो प्रकार रचा है यह देखने में आता है अर्थात सूर्य के प्रकाश से शीशा अच्छा लगता है और सूर्य की किरण से ही शीशा से अग्नि निकलती है, वैसे ही ईश्वर भजन से संतों का दर्शन प्रिय होता है और पीठ अर्थात उनका दूर गमन विरहानल से जलाने वाला होता है वा शब्द उनके सुखद होते हैं परन्तु उनके अनुसार साधन करना दुखद होता है । किन्तु कृतघ्न उनके प्रत्यक्ष उपकार को भी नहीं मानता ।
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दीये बिना सु देत है, लीये बिना सु लीन ।
यूं गुरु सन्मुख-विमुख, ज्यों आँख्यों आदित्य कीन ॥८॥
जैसे सूर्य नेत्रों के कुछ दिये बिना भी नेत्रों को प्रकाश देते हुये नेत्रों के सन्मुख रहते हैं किन्तु नेत्र सूर्य से विमुख ही रहते हैं । सामने भी नहीं देखते, वैसे ही शिष्य से कुछ लिये बिना ही गुरु उसके हित में लीन रहते हैं किन्तु कृतघ्न शिष्य गुरु के सन्मुख नहीं रहता न गुरु की आज्ञा मानता है और न सेवा करता है । जैसे नेत्र सूर्य के साथ व्यवहार करते हैं वैसे ही कृतघ्न शिष्य गुरु के साथ करता है ।
(क्रमशः)

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