सोमवार, 21 सितंबर 2020

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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग वसँत २३(गायन समय प्रभात ३ से ६ तथा वसँत ॠतु)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३७२ - **थकित निश्चल** । मदन ताल
मतिवाले पँचूँ प्रेम पूर, 
निमष न इत उत जाहिं दूर ॥टेक॥
हरि रस माते दया दीन, 
राम रमत ह्वै रहे लीन ।
उलट अपूठे भये थीर, 
अमृत धारा पीवहिं नीर ॥१॥
सहज समाधी तज विकार, 
अविनाशी रस पीवहिं सार ।
थकित भये मिल महल मांहिं, 
मनसा वाचा आन नांहिं ॥२॥
मन मतवाला राम रँग, 
मिल आसन बैठे एक संग ।
सुस्थिर दादू एक अँग, 
प्राणनाथ तहं परमानन्द ॥३॥
इति राग वसन्त समाप्त: ॥२३॥पद ९॥
सँसार भ्रमण से हार कर प्रभु स्वरूप में निश्चल हो रहे हैं, यह कह रहे हैं - शुद्ध बुद्धि वाले हम पाँचों ज्ञानेन्द्रियों में प्रभु - प्रेम भर कर स्थित हैं, अब हमारी इन्द्रियाँ प्रभु को त्याग कर क्षणिक भी इधर - उधर नहीं जाती और हम दया - दीनता से सँपन्न हरि - रस में मस्त होकर, भजन द्वारा राम में रमण करते हुये उसी में लीन रहते हैं । मन इन्द्रियों को विषयों से बदल कर तथा सँसार को पीठ देकर भगवत् स्वरूप में स्थिर हो रहे हैं । तालु - मूल से झरने वाली अमृत - धारा को जल के समान पीते हैं ।
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विकारों को त्याग कर सहज समाधि में अविनाशी और विश्व के सार ब्रह्मानँद रस का पान करते हैं । समाधि महल में प्रभु से मिलने के पश्चात् विषयों में जाने से हार मान गये हैं ।
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हम मन - वचन से कहते हैं, अब हमें अन्य कुछ भी प्रिय नहीं लगता, मन भी राम - प्रेम में मस्त होकर, इन्द्रियों के साथ एक भगवद् स्वरूप आसन पर ही बैठता है । इस प्रकार परमानन्द रूप प्राणनाथ अद्वैत प्रभु के स्वरूप में ही स्थिर हो रहे हैं ।
इति श्री दादू गिरार्थ प्रकाशिका राग वसन्त समाप्त: ॥२३॥
(क्रमशः)

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