गुरुवार, 17 सितंबर 2020

विचार का अंग ४७/५०

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ विचार का अंग ४७/५०)
.
*पहली प्राण विचार कर, पीछे आवै जाइ ।*
*आदि अंत गुण देख कर, दादू रहै समाइ ॥४७॥*
श्रेय और प्रेय ये दो मार्ग प्रसिद्ध हैं । उन दोनों मार्गों के गुण-अवगुण देखकर श्रेयमार्ग पर ही चलना चाहिये, प्रेयमार्ग पर नहीं, क्योंकि प्रेयमार्ग बन्धन तथा दुःख का देने वाला है । श्रेयमार्ग मुक्ति देने वाला है । 
कठोपनिषद् में कहा है- “श्रेय और प्रेय ये दोनों ही मार्ग मनुष्य के सामने आते हैं । बुद्धिमान् मनुष्य दोनों के स्वरूप को अच्छी प्रकार विचार करके उनको अलग-अलग समझ लेता है । वह श्रेष्ठ मनुष्य परम कल्याण के साधन को ही भोग-साधन की अपेक्षा श्रेष्ठ समझकर ग्रहण करता है । मन्दबुद्धि वाला मनुष्य लौकिक योगक्षेम की इच्छा से भोगों के साधन रूप प्रेय को ही अपनाता है ।”
.
*दादू सोच करै सो सूरमा, कर सोचै सो कूर ।*
*कर सोच्यां मुख श्याम ह्वै, सोच कियां मुख नूर ॥४८॥*
जो पहले ही कार्य अकार्य का तथा उनके फलाफल का विचार कर कार्य करता है, वह विचारवान् शूर और बुद्धिमान् है । अन्त में उसको कोई दुःख नहीं होता तथा जो कर्म करके फिर सोचता है, वह कायर और मूर्ख है मैंने बिना विचारे ही यह काम कर लिया इस प्रकार अन्त में पछताता है, उसका मुख चिन्ता से सदा मलिन रहता है । जो सोच समझ कर कर्म करता है, वह अन्त में सुखी होता है । इसीलिये लिखा है कि- “बीती हुई बात का सोच नहीं करना चाहिये । मूढ मनुष्य को हजारों स्थानों पर शोक करना पड़ता है और सैंकड़ों जगह पर भयभीत होना पड़ता है । लेकिन विद्वान् पुरुष को कहीं भी शोक नहीं करना पड़ता ।”
.
*जो मति पीछे ऊपजै, सो मति पहली होइ ।*
*कबहुं न होवै जीव दुखी, दादू सुखिया सोइ ॥४९॥*
कार्य के नष्ट होने पर जो सद्विचार पैदा होता है । यदि कार्य आरम्भ से पहले ही यह सुमति पैदा हो जाय तो जीव कभी भी दुःखी नहीं होवे और सदा ही सुखी रहे ।
.
*आदि अन्त गाहन किया, माया ब्रह्म विचार ।*
*जहँ का तहँ ले दे धर्या, दादू देत न बार ॥५०॥*
इस विचार के अंग में आदि से अन्त तक माया, ब्रह्म, जीव, ईश्वर, इन सबका विचार किया । लक्षणों द्वारा माया को मिथ्या सिद्ध किया और ब्रह्म को सत्य बतलाया जीव और ईश्वर के भेद को मिथ्या सिद्ध किया गया । अतः साधक मिथ्या माया को त्यागकर ब्रह्म की ही उपासना करे ।
.
इति विचार के अंग का पं. श्रीआत्मारामस्वामिकृत भाषानुवाद समाप्त ॥१८॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें