गुरुवार, 17 सितंबर 2020

*(“चतुर्थोल्लास” ३४/३६)*

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
*(“चतुर्थोल्लास” ३४/३६)*
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*राजा धराजू को बैराग* 
*धर्याजू जैमल जोवती त्यागू,*
*घरही मैं कीजै वैरागू ।* 
*राजनीति की छाड़ी रीति,*
*कथा कीर्तन हरि सूं प्रीति ॥३४॥* 
राजा धर्याजू जैमल ने स्त्रियों का त्याग कर दिया एवं घर में ही वैराग्य का आचरण कर रहे हैं । उन्होंने राजनीति के कार्य भी छोड दिये और भगवत कथा में अपना मन पूर्ण प्रेम से लगा दिया है ॥३४॥ 
*रैति सुखारी दुख नहीं पावे,*
*राजा कथा कहां लों गावे ।* 
*पूरब ले सु खुले कपाटू,*
*निश्‍चै गही ब्रह्म की बाटू ॥३५॥* 
राजा की प्रजा बहुत सुखी है और उन्हें कोई दु:ख नहीं है । राजा की प्रजा जो प्रेम सहानुभूति व सुन्दर प्रशासन में है उसकी क्या कथा कही जावे । राजा के पूर्व जन्म के सौभाग्य व पुण्य के कारण राजा के ज्ञान हृदय के कपाट खुल गये और निश्‍चय ही वह ब्रह्म भक्ति के रास्ते पर लग गया ॥३५॥ 
*सुत समान रेति प्रतिपारे,*
*पिता समान रीति करि धारै ।* 
*चोरी नहीं जु मुसये माला,*
*आमष भखै न जुआ मदसाला ॥३६॥* 
कोई भी जीव को न सतावे राजा का सख्त आडर राजा पुत्र के समान जनता पालन करता है और प्रजा भी पिता के समान समझ कर उसका आदर सत्कार करती है । राजा के राज्य में चोरी नहीं होती । किसी का माल सम्पति कोई नहीं हडपता है, कोई मांस भक्षण नहीं करता न जुआ खेलता और शराब शालाऐं भी नहीं है ॥३६॥
(क्रमशः)

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