🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*ज्यों राखै त्यों रहेंगे, अपने बल नांही ।*
*सबै तुम्हारे हाथ है, भाज कत जांही ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
================
*साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)*
*साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ*
.
*परिच्छेद ५०*
*दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ*
*मणिमोहन को शिक्षा, ब्रह्मज्ञान के लक्षण । ध्यानयोग*
.
श्रीरामकृष्ण अपनी छोटी खाट पर बैठे मसहरी के भीतर ध्यान कर रहे हैं । रात सात-आठ बजे होंगे । मास्टर और उनके एक मित्र हरिबाबू जमीन पर बैठे हैं । आज सोमवार, तारीख २० अगस्त १८८३ ई. है ।
.
आजकल हाजरा महाशय यहाँ रहते हैं । राखाल भी प्रायः रहा करते हैं – और कभी कभी अधर के यहाँ रहते हैं । नरेन्द्र, भवनाथ, अधर, बलराम, राम, मनोमोहन, मास्टर आदि प्रायः प्रति सप्ताह आया करते हैं ।
.
हृदय ने श्रीरामकृष्ण की बड़ी सेवा की थी । वे घर पर बीमार हैं, यह सुनकर श्रीरामकृष्ण बहुत चिन्तित हुए हैं । इसीलिए एक भक्त ने राम चटर्जी के हाथ आज दस रुपये भेजे हैं – हृदय को भेजने के लिए । देने के समय श्रीरामकृष्ण वहाँ उपस्थित नहीं थे । वही भक्त एक लोटा भी लाए हैं । श्रीरामकृष्ण ने उनसे कहा था, “यहाँ के लिए एक लोटा लाना; भक्त लोग पानी पीएँगे ।”
.
मास्टर के मित्र हरिबाबू को लगभग ग्यारह वर्ष हुए, पत्नीवियोग हुआ है । फिर उन्होंने विवाह नहीं किया । उनके मातापिता, भाई-बहन, सभी हैं । उन पर उनका बड़ा स्नेह है, और उनकी सेवा वे करते हैं । उनकी आयु अट्ठाईस-उनतीस वर्ष होगी । भक्तों के आते ही श्रीरामकृष्ण मसहरी से बाहर आए । मास्टर आदि ने उनको भूमिष्ठ हो प्रणाम किया । मसहरी उठा दी गयी । आप छोटे तख्त पर बैठकर बातें करने लगे ।
.
श्रीरामकृष्ण(मास्टर से)-मसहरी के भीतर ध्यान कर रहा था । फिर सोचा कि यह तो केवल एक रूप की कल्पना ही है । इसीलिए फिर अच्छा न लगा । अच्छा होता यदि ईश्वर बिजली की चमक की तरह अपने आपको झट से प्रकट करते ! फिर मैंने सोचा, कौन ध्यान करनेवाला है, और ध्यान करूँ ही किसका ?
.
मास्टर- जी हाँ । आपने कह दिया है कि ईश्वर ही जीव और जगत् आदि सब कुछ हुए हैं । जो ध्यान कर रहा है वह भी तो ईश्वर ही है ।
श्रीरामकृष्ण- फिर बिना ईश्वर के कराए तो कुछ होनेवाला नहीं । वे अगर ध्यान कराए, तो ध्यान होगा । इस पर तुम्हारा क्या मत है ?
मास्टर- जी, आप के भीतर ‘अहं’ का भाव नहीं है, इसीलिए ऐसा प्रतीत हो रहा है । जहाँ ‘अहं’ नहीं रहता वहाँ ऐसा ही हुआ करता है ।
.
श्रीरामकृष्ण- पर ‘मैं दास हूँ, सेवक हूँ’ – इतना अहंभाव रहना अच्छा है । जहाँ यह बोध रहता है कि मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ वहाँ ‘मैं दास हूँ और तुम प्रभु हो’ – यह भाव बहुत अच्छा है । जब सभी कुछ किया जा रहा है, तो सेव्यसेवक-भाव से रहना ही अच्छा है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें