बुधवार, 16 सितंबर 2020

विचार का अंग ४३/४६

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ विचार का अंग ४३/४६)
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*कोमल कठिन, कठिन है कोमल, मूरख मर्म न बूझै ।*
*आदि रु अंत विचार कर, दादू सब कुछ सूझै ॥४३॥*
स्त्रीसंग पहले कोमल(प्रिय) मालुम पड़ता है, किन्तु बाद में बन्धन का हेतु होने से बड़ा ही कठिन(दुःखकारक) मालुम पड़ता है । इसी तरह सन्तों का उपदेश पहले सुनने में जरा कटु सा प्रतीत होता है, किन्तु बाद में जब मुक्ति प्राप्त होती है, तब बड़ा ही सुख प्रतीत होता है । अतः साधक आदि-अन्त का परिणाम विचार कर ही किसी कार्य को करे । 
श्रीभागवत में कहा है कि- “स्त्री और उसका संग करने वाले पुरुष के संग को त्यागकर आत्मवेत्ता पुरुष एकान्त स्थान में, जहां पर कोई विघ्न न हो सके, वहाँ पर बैठकर मेरा भजन आलस्य को त्याग कर करे । स्त्री तथा उसका संग करने वालों से जैसा क्लेश तथा बन्धन होता है, वैसा क्लेश और बन्धन और किसी से भी नहीं होता ।”
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*पहली प्राण विचार कर, पीछे पग दीजे ।*
*आदि अंत गुण देख कर, दादू कुछ कीजे ॥४४॥*
साधक को पहले अपने हृदय में गुण अवगुण का विचार करके सन्मार्ग में चलना चाहिये न कि बुरे मार्ग में । ऐसे ही कार्य का फलाफल विचार कर ही कार्य करना चाहिये, जिसका फल सुखकर हो । 
सूक्तिसुधाकर में लिखा है- “अच्छी प्रकार से पचा हुआ अन्न, सुशिक्षित पुत्र, भली प्रकार शासन में रहने वाली स्त्री, अच्छी तरह से सेवित राजा, विचार पूर्ण भाषण और समझ-बूझ से किया हुआ कर्म, इन सबमें बहुत काल बीत जाने पर भी कोई दोष पैदा नहीं होता है ।”
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*पहली प्राण विचार कर, पीछे चलिये साथ ।*
*आदि अंत गुण देखकर, दादू घाली हाथ ॥४५॥*
सबसे पहले मनुष्यों के स्वभाव व व्यवहार की परीक्षा करके ही उनका संग करना चाहिये । ऐसे ही सब कार्यों का फलाफल विचार कर ही उनको करना चाहिये । 
भारवि कवि ने लिखा है- “बिना विचारे सोचे सहसा कोई कार्य नहीं करना चाहिये । क्योंकि विचारहीनता सब आपत्तियों का स्थान है । जो विचार कर काम करते हैं, उनके पास संपत्ति अपने आप ही चली आती है, क्योंकि संपत्ति भी गुणों की लोभी है, जहां गुण देखती है, वहाँ ही जाती है ।”
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*पहली प्राण विचार कर, पीछे कुछ कहिये ।*
*आदि अंत गुण देखकर, दादू निज गहिये ॥४६॥*
वचन भी विचार कर ही बोलना चाहिये, जो हितकारक और संक्षिप्त(थोड़ा) हो । मिथ्या कभी नहीं बोलना चाहिये । मिथ्या बोलने की अपेक्षा तो मौन रहना ही अच्छा है । लिखा है-
तारागण, सूर्य, चन्द्रमा, मेरुपर्वत, मन्दिर ये सब एक दिन नष्ट हो जायेंगे । पृथ्वी भी कभी समय पाकर नष्ट हो जायेगी । केवल धर्म और सज्जन के वाक्य ही कभी नष्ट नहीं होते । 
मनुस्मृति में- “सत्य और प्रिय ही वचन बोलो । यदि सत्य अप्रिय हो तो उसको मत बोलो । जो प्रिय झूठ है, उसको भी मत कहो । यह ही सनातन धर्म है । सदा सत्य और प्रिय वचन बोलने से सभी मानव प्रसन्न होते हैं । अतः बोलने में कभी दरिद्रता मत करो ।”
(क्रमशः)

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