बुधवार, 16 सितंबर 2020

*भक्त का सुख-दुःख*

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*सहजैं ही सब होइगा, गुण इन्द्रिय का नास ।*
*दादू राम संभालतां, कटैं कर्म के पास ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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*साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)*
*साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ*
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*भक्त का सुख-दुःख*
इसी बीच में दूसरे भक्त आ जुटे और काबुल के विद्रोह तथा लड़ाई की बातें होने लगी । किसी एक ने कहा कि याकूब खाँ (कबूल के अमीर) राजसिंहासन से उतार दिये गये हैं । श्रीरामकृष्णदेव को सम्बोधन करके उन्होंने कहा कि याकूब खाँ भी ईश्वर का एक बड़ा भक्त है ।
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श्रीरामकृष्ण- बात यह है कि सुख-दुःख देह के धर्म हैं । कविकंकण-चण्डी में लिखा है कि कालूवीर को कैद की सजा हुई थी और उसकी छाती पर पत्थर रखा गया था । कालूवीर भगवती का वरपुत्र था फिर भी उसे यह दुःख भोगना पड़ा । देहधारण करने से ही सुख-दुःख का भोग करना पड़ता है ।
“श्रीमन्त भी तो बड़ा भक्त था । उसकी माँ खुल्लना को भगवती कितना अधिक चाहती थीं । पर देखो, उस श्रीमन्त पर कितनी विपत्ति पड़ी ! यहाँ तक कि वह शमशान में काट डालने के लिए ले जाया गया ।”
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“एक लकड़हारा परम भक्त था । उसे भगवती के साक्षात् दर्शन हुए, उन्होंने उसे खूब चाहा और उस पर अत्यन्त कृपा की, परन्तु इतने पर भी उसका लकड़हारे का काम नहीं छूटा ! उसे पहले की तरह लकड़ी काटकर ही रोटी कमानी पड़ी । कारागार में देवकी को चतुर्भुज शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी भगवान् के दर्शन हुए, पर तो भी उनका कारावास नहीं छूटा ।”
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मास्टर- केवल कारावास ही क्यों ? शरीर ही तो सारे अनर्थ का मूल है । उसी को छूट जाना चाहिए था ।
श्रीरामकृष्ण-बात यह है कि प्रारब्ध कर्मों का भोग होता है । जब तक वह हैं, तब तक देहधारण करना ही पड़ेगा । एक काने आदमी ने गंगास्नान किया । उसके सारे पाप तो छूट गए, पर कानापन दूर नहीं हुआ ! (सभी हँसे ।) उसे अपना पूर्वजन्म का फल भोगना था, वही वह भोगता रहा ।
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मास्टर- जो बाण एक बार छोड़ा जा चूका उस पर फिर किसी तरह का वश नहीं रहता ।
श्रीरामकृष्ण- देह का सुख-दुःख चाहे जो कुछ हो, पर भक्त को ज्ञान-भक्ति का ऐश्वर्य रहता है । वह ऐश्वर्य कभी नष्ट नहीं होता । देखो, पाण्डवों पर कितनी विपत्ति पड़ी, पर इतने पर भी उनका चैतन्य एक बार भी नष्ट नहीं हुआ । उनकी तरह ज्ञानी, उनकी तरह भक्त कहाँ मिल सकते हैं ?
(क्रमशः)

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