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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*७. हैरान कौ अंग ~ १/४*
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बलि जाऊँ तेरे नांम की, तूँ अगाध किंही लाध५ ।
खोजत हैं सब मुनि जनां, जगजीवन सब साध ॥१॥
(५. किंही लाध - कैसे प्राप्त हो)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु मैं तेरे नाम की बलिहारी हूँ तुम इतने गहरे में हो कि मैं तुम्हें कैसे पाऊँ । सब मुनि जन, साधुजन भी तुम्हें खोज रहे हैं ।
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सुर नर गण गंध्रब६ मुनी, आराधैं सब साध ।
जगजीवन कीरति करै, जै जै रांम अगाध ॥२॥
(६. गंध्रब - गन्धर्व, एक देवजाति जो नृत्य गान एवं वाद्य के सहारे भगवत्स्तुति करती रहती है)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे राम जी आपकी जय हो । सभी देव गंधर्व मनुष्य सब आपकी महिमा द्वारा आपकी आराधना करते हैं । आपका यशोगान भी करते हैं ।
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जो हरि आप ही आप है, सो जांणै वह ग्यांन ।
कहि जगजीवन का कहै, यहु उतपति हम जांन ॥३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु आप समान आप ही हैं जो इस बात को जानता है वह ज्ञानी है । हम इस बात के विषय में क्या कहें संत कहते हैं यह विशद है ।
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लेखा लिखिये लेखणी, अलख लख्या नहीं जाइ ।
जगजीवन अबिगत धणी, कोई जन जाणैं ताहि ॥४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हिसाब या लेख लेखनी से लिखा जा सकता है किंतु उन अदृश्य प्रभु को नहीं देखा जा सकता कोइ विरला ही इस बात को जानता है कि वे अपार अविगत हमारे मालिक परमात्मा तक कैसे पहुंचा जा सके है ।
(क्रमशः)

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