बुधवार, 16 सितंबर 2020

*कूरम ह्वै गिरी मन्दर धारि*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
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*कोई नहिं करतार बिन, प्राण उधारणहार ।*
*जियरा दुखिया राम बिन, दादू इहि संसार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ बिनती का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*पद्य टीका*
इन्दव -
*कूरम ह्वै गिरी मन्दर धारि,*
*मथ्यो सब देव दयन्त१ समुद्रा ।*
*मीन भये सतिवर्त२ सु अंजलि,*
*ले परले दिखराई हु क्षुद्रा ॥*
*शूकर काढि मही जल मांहि रु,*
*मारि ह्रिनाक्ष सु थापि सु दुद्रा३ ।*
*सिंह स्वरूप प्रलाद उधारन,*
*दैत्य ह्रिणांकुस फारन उद्रा४ ॥१०॥*
१. भगवान् ने कच्छप अवतार लेकर मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया था तब देवता तथा दैत्य१ गण सब मिलकर समुद्र का मन्थन कर पाये थे । कच्छप अवतार का यही मुख्य कार्य है । 
२. मत्स्य अवतार लेकर अर्ध्य देते समय राजा सत्यव्रत२ की अंजलि से प्रकट हुये थे और राजा तथा सप्त ऋषियों को नौका में बैठा कर क्षुद्र प्रलय का दृश्य दिखाया था, यही मत्स्य अवतार का मुख्य कार्य है । 
३. वराह अवतार लेकर पृथ्वी को जल से ऊपर लाये तथा उसे अपने दाँतो३ पर स्थापन करके हिरण्याक्ष दैत्य को मारा था । 
४. नृसिंह अवतार लेकर भक्त प्रहलाद की रक्षा की और दैत्य हिरण्यकशिपु का पेट४ अपने नखों से फाड़ कर उसे मारा था ।
(क्रमशः)

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