गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷 
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
🌷 #०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु 🌷
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*दादू साचा गुरु मिल्या, साचा दिया दिखाइ ।*
*साचे को साचा मिल्या, साचा रह्या समाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *योग्य शिष्य गुरु*
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युवक रज्जब की बरात सांगानेर से आमेर जा रही थी मार्ग में दादूजी का आश्रम आया । रज्जब ने सुना कि यहां दादूजी हैं । उसे दर्शन की अभिलाषा थी । इसलिये अपने साथियों के साथ वहाँ गया । दादू जी ध्यानस्थ थे इसलिये कुछ देर बैठना पड़ा । ध्यान खुलने पर सब ने दण्डवत प्रणाम किया और शान्तभाव से बैठ गये । दादूजी ने देखा, एक मुसलमान युवक दूल्हा के भेष में सजा हुआ शान्तभाव से बैठा है तथा ज्ञान-पिपासु ज्ञात होता है । रज्जब के हृदय को ठीक जानकर दादूजी बोले -
"किया था शुभ काम को, सेवा कारण साज ।
दादू भूला बन्दगी, सरे न एकहु काज ॥"
इस वचन को सुन और समझ कर अपना मौर(सेहरा) सिर से उतारकर अपने छोटे भाई के आगे रखकर कहा "जाओ तुम विवाह कर लो, मैं नहीं करूंगा ।" फिर साथियों ने अनेक यत्न किये, किन्तु सब विफल हुए । रज्जब दादूजी के शिष्य हो गये और आगे चलकर अच्छे ग्रन्थाकार तथा उच्चकोटि के सन्त हुए ।
योग्य शिष्य गुरुू मिलत ही, लहे शिष्य विश्राम ।
दादू से रज्जब मिलत, तुरत भया निष्काम ॥५४॥

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