🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *#श्री०रज्जबवाणी* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*ज्यों सूवा सुख कारणै, बंध्या मूरख माँहि ।*
*ऐसे दादू हम भये, क्यों ही निकसै नांहि ॥*
=================
*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*अपलक्षण अपराध का अंग १२८*
.
यथा काच के महल में, कूकर की हो मीच ।
त्यों रज्जब हम में भई, भ्रम भूला मन नीच ॥१८॥
जैसे कांच के महल में जाने से कुत्ता अपने प्रतिबिम्बों को अपने से भिन्न कुत्ते मान कर भूँक भूँक कर मर जाता है, वैसी दशा हम मानवों की हो गई है । यह नीच मन भ्रम से एकात्म को भूलकर सिद्धान्त को भूलकर भिन्न भिन्न मानकर दु:खी होता है ।
.
कुमति काच के महल में, यहु मन श्वान समान ।
रज्जब एक अनेक ह्वै, निकस्या एक हिं जान ॥१९॥
कुबुद्धि रूप काच महल में यह मन कुत्ते के समान एक से अनेक हो जाता है और उससे निकलने से तो एक ही जानने में आता है ।
.
बिना भार भारी भये, बिन ही दुख दुख पूरि ।
जन रज्जब ज्यों नींद में, लिया१ अथारै२ चूरि३ ॥२०॥
जैसे निन्द्रा मे निमग्न३ अवस्था में छाती पर हाथ२ ले१ आवे तब ही भारी बोझ और बिना दुख ही दुख पूर्ण स्थति ज्ञात होती है । वैसे ही मानव की स्थिति है, यह भ्रम वश दुखी हो रहा है ।
.
सब दिल दर्पण सारिखे, आतम ब्रह्म विशेख१ ।
रज्जब सन्मुख विमुखतों, प्रतिविम्ब परि२ देख ॥२१॥
सब हृदय दर्पण के समान है, जीवात्मा के शरीर को दर्पण में और ब्रह्म को हृदय में विशेष१ रूप से देखें तो देखा जाता है - दर्पण के सम्मुख मुख देखता है और प्रतिविम्ब पड़ने२ पर प्रतिविम्ब रूप मुख दर्पण से विमुख पीठ देकर देखता है, वैसे ही हृदय में विचार द्वारा ब्रह्म को देखते हैं तब वृत्ति हृदय को पीठ देकर विषयों की और देखती है, वह अपना ही अपराध है, अन्य का नहीं ।
.
अपना आप बुरा करै, ता ऊपरि क्या रोष ।
घर के दीवै घर जल्या, देहि कौन को दोष ॥२२॥
घर के दीपक से घर जल जाय तब किसको दोष दे ? वैसे ही अपना आप ही बुरा करे तब उस बुराई के लिये दूसरे पर क्या क्रोध करेगा ? वह तो अपना
ही अपराध है ।
.
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित प्राणी परीक्षा का अंग १२८ समाप्तः ॥सा. ४०८४॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें