शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

*राघो पायो अजर अमर पद छाड़ी हद*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
🌷🙏🇮🇳 *#भक्तमाल* 🇮🇳🙏🌷
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*संगहि लागा सब फिरै, राम नाम के साथ ।*
*चिंतामणि हिरदै बसै, तो सकल पदार्थ हाथ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*स्वायंभुव-मनु* 
*आदि अंत मध्य बड़े द्वादश भगत तहां,* 
*सत्य स्वायंभू-मनु अखंड अजपा जपै ।*
*जा के सुत उभय उद्यौत शशि सूर सम,*
*नाती ध्रुव अटल आकाश अजहुँ तपै ॥*
*दिव्य तन दिव्य मन दिव्य दृष्टि दिव्य पन१,*
*अनन्य भगत भगवंत जी ही को थपै२ ।*
*राघो पायो अजर अमर पद छाड़ी हद३,*
*अरस परस अविनाशी संग सो दिपै४ ॥३८॥*
स्वायंभुव-मनु ब्रह्मा के पुत्र हैं, आप शरीर की आदि, मध्य और अन्तिम तीनों ही अवस्था में भगवत् भजन करते रहे हैं । दर्शन देकर भगवान् के वर माँगने को कहने पर आपने माँगा था-“आप मेरे पुत्र रूप प्रकट होने की कृपा करें ।” जो महान द्वादश भक्त हैं, आप भी उन्ही में हैं और आप सत्य स्वरूप परब्रह्म का चिन्तन अखंड अजपा जाप के रूप में करते थे । आपके प्रियव्रत और उत्तानपाद दो पुत्र हुये हैं: जो उदय होने वाले चन्द्र सूर्य के समान थे । आपका पौत्र ध्रुव हुआ है, जो अब भी आकाश में अचल होकर तपस्या कर रहा है । 
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स्वायंभूव-मनु का शरीर, मन, दृष्टि और प्रतिज्ञा१ ये सभी दिव्य थे । आप भगवान् के अनन्य भक्त थे, अपने मन में निरंतर भगवान् की ही स्थापना२ रखते थे अर्थात् निरंतर भगवान् का ध्यान करते थे । स्वायंभूव-मनु ने सर्व प्रकार के पक्षपात३ छोड़कर अजर अमर पद प्राप्त किया है और अविनाशी परमात्मा से अरस परस मिलकर उनके साथ प्रकाशित४ हो रहे हैं ।
(क्रमशः) 

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