शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

*७. हैरान कौ अंग ~ ६५/६८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*७. हैरान कौ अंग ~ ६५/६८*
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कितनी रात कितना दिवस, कोइ जांनै परमांण ।
कहि जगजीवन देव मुनि, सिध साधक जग जांन ॥६५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीवन में कितने रात व कितने दिवस हैं कोइ भी प्रमाणिक रुप से नहीं जानता संत कहते हैं कि देव मुनि सिध व साधक जन इस तरह ही ही संसार को जानते हैं ।
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अपरमांन अबिगति चरित, रवि ससि कला अनेक ।
कहि जगजीवन रांम गति, रांम हि जांनै एक ॥६६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु की लीला को किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है वह अप्रमाणित है न जानी जा सकने वाली है, जैसे सूर्य चन्द्र की अनेक कला की भांति अनेक कला युक्त है । संत कहते हैं कि प्रभु की लीला प्रभु ही जानते हैं ।
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है प्रमांन हरि का किया, वो ऊँकार अकार ।
कहि जगजीवन निरंजन, नां तिंह वार न पार ॥६७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि परमात्मा को प्रमाणित करनेवाले कहते हैं कि वह ओंकार हैं पर संत कहते हैं कि उन निरंजन देव का कोइ वार पार नहीं है ।
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पार ब्रह्म परमेस्वर, परा परी पर धाम ।
कहि जगजीवन परम गुरु, सो हरि रमता रांम१ ॥६८॥
(१. रमता रांम - सर्वव्यापक)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पारब्रह्म परमेश्वर सबसे अलग हैं उनका धाम परम है, वे परम गुरु हैं, वे सब में रमने या समाये हुए राम हैं ।
(क्रमशः)

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