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*दादू पाती प्रेम की, बिरला बांचै कोइ ।*
*बेद पुरान पुस्तक पढै, प्रेम बिना क्या होइ ॥*
(श्री दादूवाणी ~ साँच का अंग)
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*‘डुबकी लगाओ’* । गुरु का प्रयोजन । शास्त्राध्ययन
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श्रीरामकृष्ण- सरल भाव से कहो, ‘हे ईश्वर, दर्शन दो’ और रोओ और कहो, ‘हे ईश्वर, कामिनी-कांचन से मन को हटा दो ।’
“और डुबकी लगाओ । ऊपर उपर बहने से या तैरने से क्या रत्न मिलता है ? डुबकी लगानी पड़ती है ।”
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“गुरु से पता लेना चाहिए । एक व्यक्ति बाणलिंग शिव की खोज कर रहा था । किसी ने कह दिया, ‘अमुक नदी के किनारे जाओ, वहाँ पर एक वृक्ष देखोगे, उस वृक्ष के पास एक भँवर है । वहाँ पर डुबकी लगानी होगी, तब बाणलिंग शिव मिलेगा ।’ इसीलिए गुरु से पता जान लेना चाहिए ।”
ईशान- जी हाँ ।
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श्रीरामकृष्ण- सच्चिदानन्द ही गुरु के रूप में आते हैं । मनुष्य गुरु से यदि कोई दीक्षा लेता है, तो उन्हें मनुष्य मानने से कुछ नहीं होगा । उन्हें साक्षात् ईश्वर मानना होगा, तभी मन्त्र पर विशवस होगा । विश्वास हुआ कि सब कुछ हो गया ! शुद्र एकलव्य ने मिट्टी के द्रोणाचार्य बनाकर वन में बाण चलाना सीखा था । मिट्टी के द्रोण की पूजा करता था – साक्षात् द्रोणाचार्य मानकर । इसी से वह धनुर्विद्या में सिद्ध हो गया !
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“और तुम ब्राह्मण-पण्डितों को लेकर अधिक झमेला न किया करो । उन्हें चिन्ता है दो पैसे पाने की !”
“मैंने देखा है, ब्राह्मण स्वस्त्ययन करने आया है; चण्डीपाठ या और कुछ पाठ कर रहा है – पर आधे पन्ने वैसे ही उलटता जा रहा है । (सभी हँस पड़े ।)
“अपनी हत्या एक छोटी नहरनी से भी हो सकती । दूसरों को मारने के लिए ढाल-तलवार चाहिए । - शास्त्रग्रन्थादि का यही हेतु है ।”
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“बहुत से शास्त्रों की भी कोई आवश्यकता नहीं है । यदि विवेक न हो तो केवल पाण्डित्य से कुछ नहीं होता, षट्शास्त्र पढ़कर भी कुछ नहीं होता । निर्जन में, एकान्त में, गुप्त रूप से रो-रोकर उन्हें पुकारो, वे ही सब कुछ कर देंगे ।”
श्रीरामकृष्ण ने सुना है, ईशान भाटपाड़ा में पुरश्चरण करने के लिए गंगा के तट पर कुटिया बना रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण(व्यग्र भाव से ईशान के प्रति)- क्यों जी, क्या कुटिया बन गयी ? जानते हो, ये सब काम लोगों से जितने छिपे रहें, उतना ही अच्छा है । जो लोग सतोगुणी हैं, वे ध्यान करते हैं मन में, कोने में, वन में; कभी तो मच्छरदानी के भीतर ही बैठ ध्यान करते हैं ।
(क्रमशः)

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