मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*घर के मारे वन के मारे, मारे स्वर्ग पयाल ।*
*सूक्ष्म मोटा गूंथकर, माँड्या माया जाल ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ माया का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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अग्निदेव के भक्त राजा विपश्चित संसार रूप माया का पार लेने के लिये चार शरीर धारण करके निकले थे । अग्निदेव ने जहां तहां उनकी सहायता भी की थी, किन्तु चिरकाल तक भटक कर भी, वे संसार रूप माया का पार पाने में सफल नहीं हो सके थे । यह कथा योगवासिष्ठ निर्वाण प्रकरण उतरार्द्ध में विस्तार से है ।
माया महा अपार है, पार न पावे कोय ।
भूप विपश्चित भटक कर, सफल हुआ नहिं कोय ॥१७॥

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