शनिवार, 3 अक्टूबर 2020

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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३८३ - **उपदेश चेतावनी ।** पँजाबी त्रिताल
कागा रे करँक१ पर बोले, 
खाइ माँस अरु लग२ ही डोले ॥टेक॥
जा तन को रचि अधिक संवारा, 
सो तन ले माटी में डारा ॥१॥
जा तन देख अधिक नर फूले, 
सो तन छाड़ि चल्या रे भूले ॥२॥
जा तन देख मन में गर्वाना, 
मिल गया माटी तज अभिमाना ॥३॥
दादू तन की कहा बड़ाई, 
निमष मांहिं माटी मिल जाई ॥४॥
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उपदेश द्वारा सावधान कर रहे हैं - अरे ! जैसे मृतक पशु के पँजर१ पर काक पक्षी बैठकर बोलता है और माँस खाकर पास२ ही फिरता रहता है, वैसे ही सँसार के प्राणी स्वार्थी हैं, अपनी आशा पूर्ति के लिए आकर बोते हैं, प्रेम करते हैं, पास - पास फिरते हैं । 
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जिस शरीर को तूने वस्त्र, भूषणादि श्रृंगार रचकर अधिक सुन्दर बनाया है, वही तन उठाकर मिट्टी में डालेंगे । 
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जिस शरीर को देखकर मनुष्य बहुत प्रसन्न होता था और फूला नहीं समाता था, उस शरीर को छोड़ कर चला गया । 
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यह देखते हुए भी शरीराध्यास से सब प्रभु को भूल रहे हैं । जिस सुन्दर शरीर को देखकर प्राणी मन में गर्व करता था, वह भी मिट्टी में मिल गया है । 
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अत: शरीर के अभिमान को छोड़ राम नाम जप । अरे ! इस शरीर की क्या बड़ाई करता है, यह निमेष में मिट्टी में मिल जाने वाला है ।
(क्रमशः)

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