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*कुसंगति केते गये, तिनका नाँव न ठाँव ।*
*दादू ते क्यों उद्धरैं, साधु नहीं जिस गाँव ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*कुसंगति का अंग १२६*
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विष मिश्री सानी१ सहत, खाये होय सु मींच ।
त्यों तन उत्तम करणी२ कुचल३, रज्जब परिहरि४ नींच ॥१७॥
मिश्री तथा शहद् में विष मिला१ कर खाने से मृत्यु ही होती है । वैसे ही जिसका शरीर तो उत्तम है किन्तु कर्म२ मलीन३ है उस नीच को त्याग४ ही देना चाहिये, उसके संग से हानि ही होगी ।
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ज्ञान हीन गत१ गात२, ज्यों कड़वी नीरस समय ।
लगी लोभ लू३ वात४, प्राण पशू चरतों मरै ॥१८॥
ग्रीष्म ॠतु में पशुओं के लिये बोई जाने वाली ज्वार की कड़वी गर्म३ वायु४ लगने से रस हीन हो जाती है, उस समय उसे पशु खा जाय तो मर जाता है, वैसे ही जिनके शरीर२ ज्ञान हीन होने से गये१ बीते हैं और जिनके हृदय में अति लोभ लगा है उसका संग करने से प्राणी नष्ट ही होता है ।
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काल हिं बाहि करंड में, धरै कमंकल१ कंध ।
रज्जब त्यों व२ कुसंग सँग, करै अज्ञानी अंध ॥१९॥
जैसे सर्प को कीलने, विष उतारने आदि के मंत्र न जानकर भी कोई कम-अकल१ मूर्ख भयंकर काले सर्प को करंड में डालकर कंधे पर रखता है, वैसे ही जो विचार नेत्रों से हीन अज्ञानी होता है वही२ कुसंग और कुसंगियों का संग करता है ।
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पर दारा रत पारधी, जूवारी अरु चोर ।
मद्य माँस वेश्या गमन, सातों नरक अघौर ॥२०॥
१परनारी में अनुरक्त, २व्याध, ३जुआरी, ४चोर, ५मद्य पीने वाला, ६माँस भक्षण करने वाला, ७वैश्या-सेवन करने वाला, ये सातों ही अघौर१(अति घौर) नरक में जाते हैं ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित कुसंगति का अंग १२६ समाप्तः ॥सा. ४०३८॥
(क्रमशः)

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