रविवार, 4 अक्टूबर 2020

पीव पहिचान का अंग २० - ७/१०

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ पीव पहिचान का अंग २० - ७/१०)
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*दादू जिन यहु एती कर धरी, थंभ बिन राखी ।*
*सो हम को क्यों बीसरै, संत जन साखी ॥७॥*
जिस प्रभु ने सृष्टि रचकर इतनी बड़ी विशाल पृथ्वी को धारण करते हुए सब का भरन पोषण कर रहे हैं, क्या वे भक्तों के भरण पोषण को भूल जायंगे ? नहीं । इस विषय में भक्त लोग ही प्रमाण हैं । गीता में भगवान् ने स्वयं कहा है कि-भक्तों का योगक्षेम मैं चलाता हूँ । अन्यत्र भी लिखा है कि- जिसका नाम ही विश्वम्भर है, क्या वह भक्तों को नहीं देखता । 
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*दादू जिन मुझ को पैदा किया, मेरा साहिब सोइ ।*
*मैं बन्दा उस राम का, जिन सिरज्या सब कोइ ॥८॥*
जिस प्रभु ने यह विश्व रचा है, वह प्रभु ही मेरा मालिक है । मैं उसी की उपासना करता हूँ ।
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*दादू एक सगा संसार में, जिन हम सिरजे सोइ ।*
*मनसा वाचा कर्मणा, और न दूजा कोइ ॥९॥*
तन मन वाणी से सत्य कहता हूं कि सृष्टि कर्ता परमेश्वर के अलावा मेरा कोई भी सच्चा सम्बन्धी नहीं है । इन दोनों साखियों में भक्त का लक्षण बतलाया है । भक्ति रसायनामृत सिन्धु में कहा है कि-
“जो उस कृष्ण भगवान् की विशेष कृपा को प्राप्त करके अन्य की अपेक्षा नहीं रखता तथा भगवान् कृष्ण के प्रति अतुल भक्ति को धारण करता है वह वीर भक्त कहलाता है ।”
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*जे था कंत कबीर का, सोई वर वरहूँ ।*
*मनसा वाचा कर्मणा, मैं और न करहूँ ॥१०॥*
मैं मन वाणी कर्म से सत्य कहता हूँ कि जो उपास्य कबीर साहब का है वह ही मेरा भी अद्वैत ब्रह्म ही उपास्य है और नहीं । इससे श्रीदादूजी की भगवान् में अनन्य निष्ठा ध्वनित होती है ।
(क्रमशः)

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