रविवार, 4 अक्टूबर 2020

*(“चतुर्थोल्लास” ७९/८०)*

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
*(“चतुर्थोल्लास” ७९/८०)*
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*बिसरि गये सकल घरवारु,*
*हृदै ध्यान धरे निरकारु ।* 
*अह निसि सुमरे निश्‍चै रांम,*
*ब्रह्म मांहि कीनौ विश्राम ॥७९॥* 
सेवक लोग संत का उपदेश सुनकर इतने राम में तल्लीन हो गये कि उन्होंने अपने घर परिवार की सुध विचार नहीं रहा और हृदय में निराकार निरंजन का ध्यान करने लग गये । रात दिन राम में निश्‍चय कर उसी का स्मरण ध्यान करने लगे और निरंजन परब्रह्म में अपनी आत्मा जीव को विश्राम दिलाया ॥७९॥ 
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*दोहा*
*राम कहे सो राम है, पीवे सुधा की सीर ।* 
*सुख दु:ख को ताकौ नहीं, मिल्या नीर में नीर ॥८०॥* 
राम का स्मरण ध्यान जो करता है वह राम ही हो जाता है और त्रिकुटि से अमृत की धारा का पान करता है । उसको किसी प्रकार का सुख दु:ख प्रभावित नहीं करता क्योकि जिस प्रकार जल में जल मिलने के पश्‍चात् पृथक नहीं रहता उसी प्रकार ध्यानस्थ साधक ब्रह्म स्वरुप हो जाता है ॥८०॥ 
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इति श्री ज्ञान माणकदास धरयाजु जैमल प्रसंग संत प्रधान नाम वर्णन । 
॥ इति चतुर्थोल्लास संपूर्ण ॥४॥
(क्रमशः)

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