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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“पंचमोल्लास” ७/९)*
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*औ वाकौं, औ वाकौं बूझै,*
*अरस परस कहे कछु न सूझै ।*
*निसा गई रवि कियो उजारा,*
*बूझै संत कौन तुम प्यारा ॥७॥*
ये चोर आपस में एक दूसरे को रास्ता पूछते हैं एवं परस्पर बातचीत करते हैं कि मुझे कुछ नहीं दिखाई देता । रात समाप्त हो गई और प्रात: सूर्योदय होने से प्रकाश हो गया । तब उनको देख कर संतों ने पूछा प्यारे भक्तों आप कौन हैं ॥७॥
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*आप सयानैं हमकौं बूझैं,*
*तुम सौं देव कहा है गुझै ।*
*तुम दिव द्रिष्टि पर उपगारी,*
*हमारी चूक परी है भारी ॥८॥*
चोर कहते हैं आप तो बहुत समझदार हैं सब जानते हैं आप से हे देव कौन सी बात गुप्त है आप सर्वज्ञ हैं । आप तो दिव्य दृष्टि वाले हैं और लोगों का उपकार करने वाले हैं हमसे बहुत गलती हुई जो हमको भारी पड़ रही है ॥८॥
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*च्यारों नेगुरु जी से माफी मांगी*
*राखौ देव अबै की बारा,*
*हम नहीं जान्यौ मरम तुम्हारा ।*
*हे देव सरणागति लीजै,*
*चरण कमल सौं दूरि न कीजे ॥९॥*
हे देव अबकी बार हमारी रक्षा करो क्योंकि हमने आपका रहस्य नहीं समझा अत: भूल हो गई । हे देव अब हमें अपनी शरण में लेवो और हमें अपने चरण कमलों से दूर मत करो ॥९॥
(क्रमशः)

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