मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020

*(“पंचमोल्लास” ४/६)*

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
*(“पंचमोल्लास” ४/६)*
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*बात घात हम सूं नहीं छानी,*
*छल बल करौं घात अधिकानी ।* 
*मंगर थेपरी राव जु दीनी,*
*बहुतैं और सिखावनि कीनी ॥४॥* 
चौरों ने राजा से कहा कि छल कपट की बातें हमसे छिपी नहीं है हम सब तरह के छल कपट जानते हैं हम छल बल से संतों को मार देंगे । यह सुनकर राजा ने पीठ थपथपाई और उनको शाबासी दी और अनेक तरह की शिक्षा भी दी ॥४॥ 
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*मघ चले खुशी मन मांही,*
*भवानी सुमरि बाग में जांही ।* 
*और घोरे घात लगाई,*
*संतों छांनी बात न काई ॥५॥* 
वे तस्कर बडे प्रसन्न होकर बाग के लिये मार्ग में चले और भवानी का स्मरण एंव मनोति मनाकर बाग में गये । उन्होंने इधर उधर घात लगाकर संतों को हानि पहुंचानी चाही किन्तु संतों से कोई बात छिपी हुई नहीं थी वे तो सर्वज्ञ थे ॥५॥ 
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*चारों सूरदास हो गये*
*कला दिखाई संतौ ऐन,*
*सूरदास चार्यों भये नैंन ।* 
*सूरदास हो बाग में घूंमे,*
*मार्ग उनको कहीं नहीं दीखे ॥६॥* 
संतों ने उनको अपना चमत्कार दिखाया और उन चारों तस्करों की दृष्टि समाप्त हो गई और वे चारों सूरदास हो गये । सूरदास होकर बाग में रास्ता ढूंढने लगे किन्तु कोई रास्ता नहीं दिखाई दिया ॥६॥ 
(क्रमशः)

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