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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*७. हैरान कौ अंग ~ ८१/८३*
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को जांनै ए कहां है, का है किंहि थिर थूल ।
कहि जगजीवन सक्ति नहीं, अरु सब सक्ति समूल ॥८१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कोइ नहीं जानता है कि क्या स्थूल है और क्या स्थिर है कोइ शक्ति है या नहीं या सब शक्ति से उत्पन्न है ।
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कोटि पदम अक्षर कहै, अक्षर अक्षर नांम ।
कहि जगजीवन राखि रस, रसनां गावै रांम ॥८२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कोइ पदम अक्षर कहते हैं कोइ कहते हैं कि अक्षर अक्षर में प्रभु का नाम है । संत कहते हैं कि हे जीवात्मा, रसना में राम नाम का आनंद रखें ।
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आदि अंत कोई नहिं जांणै, यहु उतपति यहु ठांम ।
कहि जगजीवन अलख लखै, नां तिहि धरणि न धांम ॥८३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु के बारे में कोइ नहीं जानता कि यहां से उनकी उत्पत्ति है या यहां उनका स्थान है, संत कहते हैं कि उन अदृश्य परमात्मा को कोइ भी नहीं देख सकते ना वहां कोइ धरती है ना ही धाम है ।
इति हैरान कौ अंग संपूर्ण ॥७॥
(क्रमशः)

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