शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2020

*दोष स्वभाव गह्यो उर अन्तर*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
🌷🙏🇮🇳 *#भक्तमाल* 🇮🇳🙏🌷
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*दादू हम तैं हुआ न होइगा, ना हम करणे जोग ।*
*ज्यों हरि भावै त्यों करै, दादू कहैं सब लोग ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*शोडश पार्षदों की पद्य टीका* 
*इन्दव-*
*सोरह पारषदै मुखि जानहु,*
*सेवक भाव सु ये रिधि जोरी ।*
*श्री पति को करि हैं नित प्रीनन१,*
*ध्यान धरै जन पारत३ कोरी२ ॥*
*शाप दिवाय बनाय कही हरि,*
*आयसु पान अमी जिमि घोरी ।*
*दोष स्वभाव गह्यो उर अन्तर,*
*रीति भली सुधरी बुधि बोरी ॥२७॥*
ये १६ पार्षद मुख्य हैं, ऐसा समझो । इनने सेवक भाव को धारण करके प्रभु-सेवा रूप संपत्ति अत्यधिक रूप से एकत्र करके अपने हृदय रूप स्थान में स्थापना की है । लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु को नित्य प्रसन्न१ करते हुये उन्हीं के ध्यान में निमग्न रहते हैं और केवल२ भक्तों का पालन३ करना ही इनका बाह्य कार्य है । प्रभु ने अपनी प्रेरणा से ही सनकादिक से जय विजय को तीन जन्म तक असुर होने का शाप दिलवाकर तथा वहां प्रकट होकर उसे अच्छे रूप में बनाकर कहा- “यह शाप मेरी इच्छा से ही हुआ है, अतः इसे मेरी ही आज्ञा समझ कर जैसे अमृत में कोई वस्तु घोलकर पान करते हैं वैसे ही इस शाप में मेरो आज्ञा मिलाकर धारण करो ।” तब जय विजय ने भगवत् आज्ञा होने से दोष युक्त स्वभाव वाले असुर भाव को प्राप्त करने का विचार भी अपने हृदय में धारण कर लिया । इससे ज्ञात होता है कि-उनकी सेवा-धर्म रूप रीति कितनी अच्छी सुधरी हुई थी और उसी में उनकी बुद्धि निमग्न रहती थी ।
(क्रमशः)

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