रविवार, 11 अक्टूबर 2020

*मास्टर के प्रति उपदेश*

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*अन्तरगत औरै कछु, मुख रसना कुछ और ।*
*दादू करणी और कुछ, तिनको नांही ठौर ॥*
(श्री दादूवाणी ~ साँच का अंग)
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*परिच्छेद ५५*
*मास्टर के प्रति उपदेश*
(१)
*पण्डित और साधु में अन्तर । कलियुग में नारदीय भक्ति*
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आज बुधवार है; भाद्रपद की कृष्णा दशमी, २६ सितम्बर, १८८३ ई. । बुधवार को भक्तों का समागम कम होता है, क्योंकि सब अपने काम में लगे रहते हैं । प्रायः रविवार को समय मिलने पर भक्तगण श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने आते हैं । मास्टर को स्कूल से आज डेढ़ बजे छुट्टी मिल गयी है । तीन बजे वे दक्षिणेश्वर कालीमंदिर में श्रीरामकृष्ण के पास पहुँचे । इस समय श्रीरामकृष्ण के पास प्रायः राखाल और लाटू रहते हैं । आज दो घण्टे पहले किशोरी आए हुए हैं । कमरे के भीतर श्रीरामकृष्ण छोटे तख्त पर बैठे हुए हैं । मास्टर ने आकर भूमिष्ठ हो प्रणाम किया । श्रीरामकृष्ण ने कुशल-प्रश्न पूछकर नरेंद्र की बात चलायी ।
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श्रीरामकृष्ण(मास्टर से)- क्यों जी, क्या नरेन्द्र से भेंट हुई थी ? (सहास्य) नरेन्द्र ने कहा है, ‘वे अब भी कालीमन्दिर जाया करते हैं; जब ठीक ज्ञान हो जाएगा तब फिर वे कालीमन्दिर में नहीं जाएँगे ।’
“कभी कभी वह यहाँ आता है, इसलिये उसके घरवाले बहुत नाराज हैं । उस दिन यहाँ गाड़ी पर चढ़कर आया था । गाड़ी का किराया सुरेन्द्र ने दिया था । इस पर नरेन्द्र की बुआ सुरेन्द्र के यहाँ लड़ने गयी थी ।”
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श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र की बात कहते हुए उठे । बातचीत करते हुए उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में जाकर खड़े हुए । वहाँ हाजरा, राखाल आदि भक्तगण हैं । तीसरे पहर का समय है ।
श्रीरामकृष्ण- वाह, तुम तो आज खूब आ गए ! क्यों, स्कूल नहीं है क्या ?
मास्टर- आज डेढ़ बजे छुट्टी हो गयी थी ।
श्रीरामकृष्ण- इतनी जल्दी क्यों ?
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मास्टर- विद्यासागर स्कूल देखने गए थे । स्कूल विद्यासागर का है, इसीलिए उनके आने पर लड़कों को आनन्द मनाने के लिए छुट्टी दी जाती है ।
श्रीरामकृष्ण- विद्यासागर सच बात क्यों नहीं कहता ?
“सत्य बोलता रहे और परायी स्त्री को माता जाने, इन दो बातों से अगर राम न मिलें, तो तुलसीदास कहते हैं, मेरी बातों को झूठ समझो । सत्यनिष्ठ रहने से ही ईश्वर मिलते हैं । विद्यासागर ने उस दिन कहा था यहाँ आऊँगा, परन्तु फिर न आया ।”
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“पण्डित और साधु में बड़ा अन्तर है । जो केवल पण्डित है, उसका मन कामिनी-कांचन पर है । साधु का मन श्रीभगवान् के पादपद्मों में रहता है । पण्डित कहता कुछ है और करता कुछ है । साधु की बात जाने दो । जिनका मन ईश्वर के चरणारविन्दों में लगा रहता है, उनके कर्म और उनकी बातें और ही होती हैं । काशी में मैंने एक नानकपन्थी लड़का साधु देखा था । उसकी आयु तुम्हारे इतनी होगी । मुझे ‘प्रेमी साधु’ कहता था । काशी में उनका मठ है । 
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एक दिन मुझे वहाँ न्यौता देकर ले गया । महन्त को देखा जैसे एक गृहिणी । उससे मैंने पूछा, ‘उपाय क्या है ?’ उसने कहा, ‘कलियुग में नारदीय भक्ति चाहिये ।’ पाठ कर रहा था, पाठ में समाप्त होने पर कहा- ‘जले विष्णुः स्थले विष्णुर्विष्णुः पर्वतमस्तके । सर्वं विष्णुमयं जगत् ।’ सब के अन्त में कहा, ‘शान्तिः ! शान्तिः ! प्रशान्तिः !’
(क्रमशः)

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