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🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ पीव पहिचान का अंग २० - ३२/३४)
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*लोहा पारस परस कर, पलटै अपणा अंग ।*
*दादू कंचन ह्वै रहै, अपने सांई संग ॥३२॥*
जैसे लोहा पारसमणि के संयोग से लोह भाव को त्याग कर सुवर्ण हो जाता है । वैसे ही सद्गुरु की कृपा से जीव भी जीव भाव को त्याग कर ब्रह्म रूप हो जाता है ।
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*दादू जिहिं परसे पलटै प्राणियाँ, सोई निज कर लेह ।*
*लोहा कंचन ह्वै गया, पारस का गुण येह ॥३३॥*
पारसमणि में यह गुण विशेष है कि, उसके संपर्क से लोहा सुवर्ण बन जाता है । ऐसे ही जिस सद्गुरु के उपदेश से शिष्य जीव भाव को त्याग कर ब्रह्म भाव को प्राप्त हो जाय वह ही सद्गुरु कहलाता है ।
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*॥ परचै जिज्ञासा उपदेश ॥*
*दह दिशि फिरै सो मन है, आवै जाय सो पवन ।*
*राखणहारा प्राण है, देखणहारा ब्रह्म ॥३४॥*
जो संकल्प विकल्प करता हुआ इधर उधर दशों दिशाओं के विषयों में दौड़ता रहता है वह मन, और जो शरीर से बाहर आ जाता है, वायु का विकार स्थूल सूक्ष्म शरीर का रक्षक है वह प्राण आत्मा है, और इन सब को जो साक्षी भाव से देखता है, वह दृष्टा चेतन साक्षी कहलाता है । इस साक्षी का ब्रह्म से अभेद होने के कारण यह ब्रह्म रूप ही है । इस प्रकार साधक अपने को दृष्टा मान कर मुक्त हो जाता है ।
विवेकचूडामणि में कहा है कि- नित्य विभु सर्वगत अत्यन्त सूक्ष्म अन्तः शून्य तथा बहिः शून्य विज्ञानमय आत्मा को निजरूप से जानकर साधक रजोगुण से रहित निष्पाप तथा मृत्यु रहित हो जाता है ।
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॥ इति पीव पिछाण के अंग का पं. आत्मारामस्वामीकृत भाषानुवाद समाप्त ॥२०॥
(क्रमशः)
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