गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

*८. लै कौ अंग ~ ५/८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
.
*८. लै कौ अंग ~ ५/८*
.
रोम रोम रसना अनंत, रांम रांम ल्यौ लाइ ।
कहि जगजीवन देह स्यूं, सहजै परसै ताहि३ ॥५॥
(३. ताहि - उस स्वामी का) 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हर रोम छिद्र जिह्वा हो और राम नाम की लौ लगी हो तो ऐसी देह को सहज ही परमात्मा का सानिध्य प्राप्त होता है ।
.
परसि पुरातन अंग हरि, पावन करै सरीर ।
कहि जगजीवन लाय ल्यौ, सहज सुन्नि करि सीर४ ॥६॥
(४. सीर - साथ)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि परम पुरातन पुरुष का सानिध्य देह को पावन करता है । संत कहते हैं कि परमात्मा से लय लगने पर सहज ही शून्य की सहभागिता हो जाती है जो निर्विकार है ।
.
असत५ तुचा६ इनकी क्रिपा, कोई जांणौं कोइ नांहि ।
कहि जगजीवन ब्रह्म रिषि, बिलै मांन करि सांइ ॥७॥ 
(५. असत - अस्थि) (६. तुचा - त्वक्, चर्म)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अस्थि व त्वचा सब परमात्मा की दया है इसे कोइ जानता है कोइ नहीं । संत कहते है ब्रह्म ऋषि इसे लय में ही विलय कर देते है ।
.
असत तुचा इन मांहि वो, वो मांही ए वास ।
वो जांणै ए बखांणै, सु कहि जगजीवनदास ॥८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो ये अस्थि त्वचा है इन में वो समाये हैं । और ये अस्थि त्वचा वाले उन पर आश्रित हैं । वे जानते परमात्मा सब जानते हैं और ये प्रभु का विरद बखानते हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें