गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

*(“पंचमोल्लास” १०/१२)*

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
*(“पंचमोल्लास” १०/१२)*
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*दीन देखि अति कृपा कीनी,**ज्ञान ध्यान सिखावन दीनी ।* 
*ज्यूं के त्यूं है दृग सु आये,**दर्सन देखि बहुत सुख पाये ॥१०॥*
संतों ने उन्हें दीन हीन देखकर उन पर बहुत कृपा की और उनको प्रभु के ज्ञान ध्यान की शिक्षा प्रदान की । उनके पहले जैसे नैत्र व दृष्टि थी उसी प्रकार संत कृपा से पुन: हो गये और उन्होने संतों के दर्शन कर बहुत आनंद हुआ ॥१०॥ 
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*चारु भजन सत्संग में लीन हो गये*
*भजनानंदी भये करारु,*
*हृदय विराजै निज निरकारू ।* 
*हिरदा कंवल में बसे सु रांम,*
*कीजै चितवनि इकंत विश्राम ॥११॥* 
वे तस्कर बहुत दृढता से भगवान का भजन करने वाले हो गये और अपने हृदय में निरन्तर निराकार निरंजन का विश्राम स्थल बना लिया । उनके हृदय कमल में राम का वास हो गया और एकान्त में रहकर ध्यान में लीन रहने लगे ॥११॥ 
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*दौ दासियों की गाथा शिवनी खीवनी*
*पलटी देही देखत नैन,*
*मुक्ति ग्रामी भये सु ऐन ।* 
*कही कथा तस्कर चारों की,*
*अब सुनाऊं द्वै दासी की ॥१२॥* 
देखते देखते उन तस्करों का शरीर पलट कर दिव्य हो गया और वे तस्कर संसार से स्वतन्त्र होकर मुक्ति के मार्ग में लग गये । मैने चार तस्करों की कथा कही है अब दो दूतियों दासी की कथा सुनाता हूं ॥१२॥
(क्रमशः)

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