रविवार, 8 नवंबर 2020

*मारग नैन विछाय रहै*

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*जतन-जतन कर पंथ निहारूँ,*
*पीव भावै त्यों आप सँवारूं ॥*
*अब सुख दीजे जाऊँ बलिहारी,*
*कहै दादू सुन विपति हमारी ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ७)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*ल्यावत बेर वसेर१ लगी हरि,*
*चाखि धरै फल रामहिं मीठे ।*
*मारग नैन विछाय रहै,*
*रघुराई चले कब आयसि ईठे२ ॥*
*देखत माग घणे दिन बीतत,*
*दूर गये दुख आवत दिठे ।*
*न्यून शरीर हिं जान छिपी किहिं,*
*बूझत आपन श्यौरि कईठे३ ॥३६॥*
हरि के आने की अभिलाषा१ लगी हुई थी, इस लिये वह बेर के फल लाती थी किन्तु लाते समय चखती थी, जिस वृक्ष के मीठे होते ये उसी के लाकर रामजी के लिये रखती थी । मार्ग में अपनी दृष्टि फैलाये रहती थी और विचार करती थी कि भगवान् राम इस मार्ग से चल कर यहां२ कब आयेंगे ।
इस प्रकार मार्ग देखते देखते बहुत दिन व्यतीत हो गये थे । फिर एक दिन भगवान् राम और लक्ष्मणजी को आते देखकर उसके सभी दुःख नष्ट हो गये । फिर भी अपने शरीर को हीन जाति का जान कर वह संकोच के मारे कहीं छिप गई थी, कुछ दूर पर स्वयं रामजी ने ही पूछा- यहां शबरी कहां३ रहती है ।
(क्रमशः)

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