रविवार, 8 नवंबर 2020

*९. निहकर्मी कौ अंग ~ ९/१२*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*९. निहकर्मी कौ अंग ~ ९/१२*
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जा तैं उतपति जीव की, जनम भूमि सो ठांम ।
कहि जगजीवन कुटुम्ब कुल, हरिजन३ के हरि नांम ॥९॥
(३. हरिजन=भगवद्गक्त)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिससे जीव उत्पन्न होता है वह ही जन्मभूमि होती है । और प्रभु के विभिन्न नाम ही प्रभु जन के संबंधी है । जिस प्रकार संसार के सबंधी जन संसारी लोगों के काम आते हैं प्रभु जन के वैसे ही स्मरण काम आता है ।
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नहिं तहं करम नहीं तहं काल, नहीं तहं कोई आल जंजाल४ ।
है तहां प्रेम प्रीति ल्यौ सार, है तहां आनंद अधिक अपार ॥
है तहां झिलमिल ज्योति प्रकास, सुख निधि ले जगजीवनदास ॥१०॥
(४. आल जंजाल=भ्रमात्मक ज्ञान)
संतजगजीवन जी कहते है कि जहाँ न ही कर्म प्रयास है, न ही जहाँ मृत्यु भय है, नहीं जहाँ कोइ अन्य विघ्न जंजाल है जहां केवल प्रेम प्रीति ही है वहां असीमित आनंद है ।
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रांम नांम मंहि बोझ सिर, गुन का आवै नांहि ।
कहि जगजीवन सहज हरि, अबिगत चीन्है मांहि५ ॥११॥
(५. उस अविनाशी का ह्रदय में साक्षात्कार करै)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मात्र राम रटना ये भी भार है इससे कोइ लाभ नहीं है । सहज रुप से भजन कर प्रभु का अतरं में साक्षात्कार ही श्रेष्ठ है ।
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एक ले आवै अगम की, जहां न निगम प्रवेस ।
जगजीवन तो जाणिये, सहि गया६ वो ही देस ॥१२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि एक परमात्मा की ऐसी लय अतंर में लगती है कि वहां से न कुछ बाहर जाता है ना आता है जो इस प्रकार इस स्थिति के अनुकूल होगया उसे ही परमात्मा के अनुकूल हुआ जानें ।
(क्रमशः)

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