शनिवार, 7 नवंबर 2020

= ४०० =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
४०० - *शूरातन कसौटी* । भँगताल
तूँ साहिब मैं सेवक तेरा,
भावै शिर दे शूली मेरा ॥टेक॥
भावै करवत शिर पर सार,
भावै लेकर गरदन मार ॥१॥
भावै चहुं दिशि अग्नि लगाइ,
भावै काल दशों दिशि खाइ ॥२॥
भावै गिरिवर गगन गिराइ,
भावै दरिया मांहिं बहाइ ॥३॥
भावै कनक कसौटी देहु,
दादू सेवक कस कस लेहु ॥४॥
.
भगवान् के बनने में कष्ट सहनता रूप शौर्य दिखा रहे हैं - आप मेरे स्वामी हैं, मैं आपका सेवक हूं । चाहे आप मेरे शिर के शूली लगादें,
.
शिर पर करवत चलावें, गले में तलवार मारें,
.
चारों ओर अग्नि लगादें, चाहे दशों दिशा काल रूप होकर मुझे खाने लगें, चाहे विशाल पर्वत वो बहुत ऊंचे ले जाकर आकाश से गिरादें, दरिया में बहादें
.
सुवर्ण को जैसे सुनार बारम्बार अग्नि लगाते हैं, वैसे ही मुझे बारम्बार कष्ट दें और भी आप चाहे नाना प्रकार के कष्ट देकर मुझे अपनायें, तो भी सभी मुझे स्वीकार हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें