शनिवार, 7 नवंबर 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*दादू रोजी राम है, राजिक रिजक हमार ।*
*दादू उस प्रसाद सौं, पोष्या सब परिवार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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शंकराचार्य एक संतोषी गरीब ब्राह्मण के घर भिक्षा को गये । उन्हें देखते ही ब्राह्मणी सम्मुख आकर हाथ जोड़ कर बोली - भगवन ! ब्राह्मण देवता इतनी ही भिक्षा लाते हैं जो एक समय का दोनों का काम चल जाता है । घर में देने योग्य भिक्षा न होने से मुझे बड़ा दु:ख है । आचार्य - माता ! धैर्य धरो जो भी तुम्हारे घर में हो वही वस्तु मुझे दे दो ।
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ब्राह्मणी घर में घुसी सम्मुख ताक पर में एक हरड़ मिली वही आचार्यजी की झोली में डाल दी । आचार्य प्रसन्न होकर सम्मुख एक श्रीमान के घर गये, श्रीमान की पत्नि को प्रथम ही ज्ञात था कि - आचार्य भिक्षा को पधारेंगे । उसने एक रत्नथाल सजा रखा था उसे लेकर, आचार्य को देने लगी । आचार्य ने कहा - सम्मुख घर में दे आओ ।
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उसने आचार्य के कथनानुसार कर दिया और गरीब ब्राह्मण का दु:ख दुर हो गया । ऐसे ही महानुभावों को भोजन मात्र मांगने का अधिकार है । लोभवश इन्द्रिय पोषण के लिये मांगना उचित नहीं ।
याचक के अधिकारि तो, लेकर देते सुख ।
इसक हरी तक की ले हरा, शंकर ने सब दु:ख ॥११२॥

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