सोमवार, 8 सितंबर 2014

= साक्षीभूत का अँग ३५(१३/१५) =

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टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*साक्षीभूत का अंग ३५*
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*केई सेवक ह्वै रहे, केई साधु संगति मांहि ।*
*केई आइ दर्शन करैं, हम तैं होता नांहि ॥१३॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! कई सांसारिक प्राणी, अनेक प्रकार की वासना लेकर सेवक बन रहे हैं । वैसे ही कई साधुओं की संगति करते हैं । कितने ही आ - आकर दर्शन करते हैं, परन्तु निष्कामी अन्तर्मुखी संतजनों ने इन बहिरंग दिखावटी सब कर्मों का त्याग किया है ॥१४॥ 
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*ना हम करैं करावैं आरती, ना हम पिवैं पिलावैं नीर ।*
*करै करावै सांइयाँ, दादू सकल शरीर ॥१४॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! मुक्तजन अन्तर्मुखी संत कहते हैं कि न तो हम बहिरंग आरती करते हैं, और न कराते हैं, वैसे ही न हम पीते हैं, और न पिलाते हैं । कर्ता करने वाला, कराने वाला, हमारे तो केवल अधिष्ठान चैतन्य ही है । वह सब शरीरों में सूत्र आत्मा रूप से व्यापक हो रहा है । ऐसे मुक्त पुरुष व्यष्टि अहंकार से रहित होकर समष्टि चेतन में अभेद हो गये हैं ॥१५॥ 
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*करै करावै सांइयाँ, जिन दिया औजूद ।*
*दादू बन्दा बीच में, शोभा को मौजूद ॥१५॥* 
टीका - हे जिज्ञासु ! मुक्त पुरुषों का निश्चय रूप यह व्यवहार है कि जिस समर्थ ने यह औजूद, शरीर दिया है, वही इसमें कर्ता कराने वाला आप है । अपने अनन्य दासों के अन्तःकरण में स्थित होकर, उनको संसार में शोभा दिलाते हैं, परन्तु वह अनन्य दास, अपने को कर्ता नहीं मानते ॥१६॥ 
(क्रमशः)

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