मंगलवार, 9 सितंबर 2014

**सीकरी प्रसंग १८ वां दिन**

 
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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**सीकरी प्रसंग १८ वां दिन**
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१८ वे दिन अकबर बादशाह ने कहा - असद्गुरु को तो मैं समझ गया अब आप सद्गुरु सम्बंधी विचार भी कहैं । दादूजी ने कहा -
सद्गुरु दाता जीव का, श्रवण शीश कर नैन ।
तन मन सौंज सँवार सब मुख रसना अरु बैन ॥८॥
सद्गुरु पशु मानष करैं, मानुष तैं सिध सोय ।
दादू सिध तैं देवता, देव निरन्जन होय ॥१२॥
दीन गरीबी गहि रह्या, गरवा गुरु गम्भीर ।
सूक्ष्म शीतल सुरति मति, सहज दया गुरु धीर ॥४८॥
(गुरुदेव अंग १)
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इत्यादिक सद्गुरु सम्बंधी साखियां सुनाकर अकबर को समझाया । फिर अकबर ने कहा - कृष्ण ने रास के समय जितनी गोपियां थीं उतने ही शरीर धारण कर लिये थे, सात वर्ष के बालक में ऐसी शक्ति कहां से आई ? यह सुनकर दादूजी ने नीचे लिखी साखियों से अकबर को समझाया ।
कुंजर को कीड़ी करे, कीड़ी कुंजर होय ।
निशि अंधयारी दिन करे, दिन को रजनी सोय ॥२॥
मृतक काढ़ मसाण तैं, कहु कौन चलावे ।
भविगति गति न जाणिये, जग आण दिखावे ॥७॥
गुप्त गुण सु परगट करे, परगट गुप्त समाय ।
पलक मांहिं भाने घड़े, अविगति लखी न जाय ॥८॥
(समर्थ अंग २१)
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उक्त साखियां सुनाकर कहा - ईश्‍वर के चरित्र में शंका करना उचित नहीं है । वे समर्थ हैं । अकबर ने कहा - कोई प्रत्यक्ष उदाहरण बतावें तब ही संतोष होगा, अन्यथा तो यह शंका बनी ही रहेगी । दादूजी ने कहा - थोड़े बाग के क्यारों में भ्रमण कर आओ । दादूजी की आज्ञा से अकबर आमेर नरेश भगवतदास और वीरबल तीनों क्यारों में गये तो आगे एक वृक्ष के नीचे दादूजी को ध्यानस्थ देखा । ध्यानस्थ होने से बोले नहीं ।
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उक्त प्रकार ही प्रत्येक वृक्ष के नीचे दादूजी विराजे हुये थे । इससे आश्चर्य में पड़कर बादशाह ने पू़छा - आपको यहां आये तो आप यहां भी बैठे हें यह क्या लीला है ? दादूजी ने कहा - यह तुम्हारे प्रश्‍न का प्रत्यक्ष उदाहरण है । जब एक साधारण योगी भी अनेक शरीर धारण कर सकता है तब महान योगेश्वर कृष्ण के लिये अनेक शरीर धारण करने में क्या आश्चर्य है ? अकबर ने मान लिया । फिर सत्संग का समय समाप्त हो गया । अतः दादूजी की प्रसंशा करते हुये सब राज भवन को चले गये ।

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