गुरुवार, 5 नवंबर 2020

= ३९९ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
३९९ - *निष्काम साधु* । उदीक्षण ताल
ऐसा अवधू राम पियारा,
प्राण पिंड तैं रहे नियारा ॥टेक॥
जब लग काया तब लग माया,
रहे निरन्तर अवधू राया ॥१॥
अठ सिधि भाई नौ निधि आई,
निकट न जाई राम दूहाई ॥२॥
अमर अभय पद वैकुण्ठ वास,
छाया माया रहे उदास ॥३॥
सांई सेवक सब दिखलावै,
दादू दूजा दृष्टि न आवै ॥४॥
.
निष्काम सँत का परिचय दे रहे हैं - ऐसा अवधूत सँत राम का प्यारा होता है - जो स्थूल - सूक्ष्म सँघात की आसक्ति से अलग रहता है ।
.
जब तक शरीराध्यास है तब तक ही माया है । श्रेष्ठ अवधूत शरीराध्यास से रहित होकर वृत्ति द्वारा निरन्तर आत्म - स्वरूप ब्रह्म में ही स्थिर रहता है ।
.
हे भाई ! अष्टसिद्धि तथा नव निधि आवें तो भी उनके पास तक नहीं जाता और कहता है – तुम्हें राम की शपथ है, मेरे पास न आना ।
.
देवताओं का अभय स्थान, वैकुण्ठ का निवास, इनको माया की छाया जान कर इनसे उपराम रहता है वो माया की छाया रूप सँसार से विरक्त होकर परब्रह्म का जो अमर अभय स्वरूप है, उसी में निवास करता है अर्थात् ब्रह्म से अभिन्न होकर रहता है ।
.
भगवान् सेवक को देने के लिये सभी कुछ दिखलाते हैं किन्तु उक्त प्रकार निष्काम अवधूत सँत की दृष्टि में आत्म - स्वरूप ब्रह्म को छोड़कर अन्य कुछ भी नहीं आता ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें