शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

*कोटिक ब्राह्मण या पर वारै ॥*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
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*निर्मल गुरु का ज्ञान गहि, निर्मल भक्ति विचार ।*
*निर्मल पाया प्रेम रस, छूटे सकल विकार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*नैन मिले न गिनै तन छोतन१,*
*सोचन सोत३ परीन२ निकारै ।*
*भक्ति प्रवाह भले ऋषि जानत,*
*कोटिक ब्राह्मण या पर वारै ॥*
*राखि लिई ऋषि आश्रम में उन,*
*क्रोध भरे सब पांति निवारै ।*
*आवत राम करो तुम दर्शन,*
*मैं परलोकउ जात सवारै ॥३४॥*
शबरी की दृष्टि तो ऋषि के सामने नहीं होती थी, वह अपनी जाति को अछूत१ मानकर चिन्ता के प्रवाह में पड़ रही थी । इधर मतंगजी भी सोचने लगे, मैं चिन्ता के प्रवाह३ में पड़ी२ हुई इसको कैसे निकालूं । वे राम भक्ति का प्रताप तो भली-भांति जानते ही थे, इस कारण शिष्यों से कहने लगे यह जाति की तो नीच है किन्तु इसकी भक्ति तो ऐसी है कि कोटिन ब्राह्मण इस पर निछावर किये जा सकते हैं । 
फिर उसे ऋषि ने आश्रम में ही रख लिया, इससे क्रोधित होकर वहां के अन्य सब ऋषियों ने उन्हें जाति-पांति से अलग कर दिया किन्तु मतंगजी को इसका लेश भी विचार न हुआ । फिर मतंगजी के देह त्याग का समय आया तब वे शबरी को कहने लगे, मैं तो अब शीघ्र ही परलोक को जाऊंगा और तुम यहां रहो, भगवान् राम यहां आयेंगे तुम उनका दर्शन करना ।
(क्रमशः)

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