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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*बेली का अंग ३६*
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*दादू बेली आत्मा, सहज फूल फल होइ ।*
*सहज सहज सतगुरु कहै, बूझै बिरला कोइ ॥४॥*
टीका - हे जिज्ञासु ! अन्तःकरण की आत्माकार वृत्ति रूप बेली, सहज समाधि में स्थित होने पर इसके निष्काम भक्ति रूप फूल और ज्ञान रूपी फल लगता है । सत्य उपदेश के देने वाले ब्रह्मनिष्ठ सतगुरु सहज - सहज इस बेली को अपने अनुभव रूप उपदेश जल से सींचते हैं । उपरोक्त फल - फूल लगने वाली बेली को अपने प्रयत्न से ब्रह्माकार बनाते हैं । परन्तु इस सतगुरु के भेद को कोई उत्तम जिज्ञासु ही जानते हैं ॥४॥
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*जे साहिब सींचै नहीं, तो बेली कुम्हलाइ ।*
*दादू सींचै सांइयाँ, तो बेली बधती जाइ ॥५॥*
टीका - हे जिज्ञासु ! ब्रह्मनिष्ठ सतगुरु जिज्ञासु की वृत्ति रूप बेली को अपने सत्य उपदेश रूपी जल से नहीं सींचें, तो साधक की वृत्तिरूप बेली मुरझाती है, अर्थात् उदास रहती है । और सतगुरु भक्ति - वैराग्य - ज्ञान रूपी जल से सींचते रहें, तो यह बेली साक्षी कूटस्थ रूप वृक्ष पर अपना विस्तार करती रहती है अर्थात् स्वरूपाकार बनी रहती है ॥५॥
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*हरि तरुवर तत आत्मा, बेली कर विस्तार ।*
*दादू लागै अमर फल, कोइ साधू सींचनहार ॥६॥*
टीका - हे जिज्ञासु ! कूटस्थ साक्षीरूप हरि तो वृक्ष हैं और जिज्ञासु की आत्माकार वृत्ति बेली है । जैसे वृक्ष का सहारा लेकर बेली पनपती है, वैसे ही साधक की चैतन्य रूप बेली, कूटस्थ साक्षी का विचाररूपी आसरा लेकर स्वरूपाकार विस्तार को प्राप्त होती है । उस बेली के ज्ञान - रूपी अमृत फल लगता है, परन्तु इस बेली को कोई सच्चे काछ - वाछ निष्कलंक ब्रह्मनिष्ठ संत, अपने उपदेशों से सींचने वाले होते हैं ॥६॥
(क्रमशः)

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