शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

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#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
ज्यों ज्यों पीवै राम रस, त्यों त्यों बढै पियास । 
ऐसा कोई एक है, बिरला दादू दास ॥ 
राता माता राम का, मतवाला मैमंत । 
दादू पीवत क्यों रहै, जे जुग जांहि अनन्त ॥ 
दादू निर्मल ज्योति जल, वर्षा बारह मास । 
तिहि रस राता प्राणिया, माता प्रेम पियास ॥ 
रोम रोम रस पीजिए, एती रसना होइ । 
दादू प्यासा प्रेम का, यों बिन तृप्ति न होइ ॥ 
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साभार : Gauri Mahadev ~ 
मनुष्य क्यों धन का इतना स्मरण रखता है ? क्योँ पद का मरते दम तक पीछा करता है ? एक ही स्मरण प्राणोँ मे बना रहता है पद! पद! कैसे भी मिले। मनुष्य क्योँ धन, पद, संसार का इतना स्मरण करता है ? 
परमात्मा को स्मरण करने के पहले इस तथ्य को समझना जरुरी है। इस तथ्य की समझ जितनी गहरी होता जाएगी उतना ही संसार का स्मरण शिथिल हो जाएगा। यदि ये दिखाई पड़ गया कि धन से, पद से कभी किसी को कुछ नहीं मिला और मिल भी नही सकता; ये यात्रा झूठी है तो धन का, पद का स्मरण स्वयमेव अवरुद्ध हो जाएगा। 
मनुष्य ठीक से संसार की आकांक्षा को समझे तो उसी समझ से ये बोध आएगा कि सब व्यर्थ है। और जैसे ही संसार की आकांक्षाएं शून्य हुई-उसी क्षण याद उठती है परमात्मा की। 
मनुष्य के किये नहीं उठती वो तो पुरानी आकांक्षाएं गिरने से अवाक रह जाता है। 
उस अचाह की अवस्था मे भीतर एक नया सरगम बजता है, एक नई सुवास उठती है। 
उसी का नाम परमात्मा है।

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