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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*साक्षीभूत का अंग ३५*
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*देवै लेवै सब करै, जिन सिरजे सब कोइ ।*
*दादू बन्दा महल में, शोभा करैं सब कोइ ॥१७॥*
टीका - हे जिज्ञासु ! जिसने तीन लोक और चौदह भवन रचे हैं, वही समर्थ इनमें निवास करने वाले, जीवों को प्रारब्ध – कर्मानुसार, देते - लेते हैं । परन्तु अनन्य भक्त तो अन्तःकरण रूपी महल में, निष्काम स्मरण रूप सेवा में लगे हैं और संसार में सभी लोग, उन भक्तों की शोभा करते हैं ॥१७॥
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*कर्ता साक्षीभूत*
*दादू जुवा खेले जाणराइ, ताको लखै न कोइ ।*
*सब जग बैठा जीत कर, काहू लिप्त न होइ ॥१८॥*
इति साक्षीभूत का अंग सम्पूर्णः ३५॥ साखी १८॥
टीका - हे जिज्ञासु ! वह जाणराइ अन्तर्यामी, घट - घट की जानने वाले परमात्मा, आप स्वयं सम्पूर्ण बाजी रचकर आप ही खिलाड़ी बन रहे हैं । किन्तु अज्ञानरूप आवरण होने से, साधारण प्राणी उसको देख नहीं सकते और वह आप स्वयं कूटस्थ चैतन्य, सबको जीत कर साक्षीरूप से स्थित हो रहे हैं । और किसी भी बन्धन से वे बँधे हुए नहीं हैं ॥१८॥
इति साक्षीभूत का अंग टीका सहित सम्पूर्णः ३५॥ साखी १८॥
(क्रमशः)

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