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*मन मतवाला राम रंग, मिल आसण बैठे एक संग ।*
*सुस्थिर दादू एकै अंग, प्राणनाथ तहँ परमानन्द ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ३७२)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*आप लग्यो फल सार खवावन,*
*चैन भयो तिय को समझाई ।*
*कृष्ण कहै यह स्वाद लगे मम,*
*प्रेम मिल्यो वह को सरसाई१ ॥*
*नारि कहा जरि जाहु यहैं कर,*
*छयोंत खवाय महा पछताई ।*
*हैत बखान कर्यो उन दंपति,*
*जानत सो हरि भक्ति कराई ॥५५॥*
फिर स्वयं विदुरजी फल का सार गिर खिलाने लगे तब उन्हें कुछ सुख हुआ फिर पत्नी को समझाते हुये बोले- खिलाना चाहिये गिर और तुम छिलका खिला रही थी, कुछ समझ तो रक्खा करो । फिर भगवान् कृष्ण ने कहा- यह गिर भी मुझे स्वादु तो लगी है किन्तु वह छिलका प्रेम रस से पूर्ण होने से अत्यन्त सरस था अर्थात् बहुत ही स्वादु था, कहा भी है-
“तत वेता तिहूँ लोक में, भोजन किये अपार ।
कै शबरी कै विदुर घर, रूचि पायो दो बार ॥”
फिर विदुरानी ने छिलके खिलाने का पश्चाताप करते हुये कहा- इन मेरे हाथों ने इतना अपराध किया है कि-यह जल जायें तो भी अच्छा ही हो । विदुरानी ने छिलका और विदुर ने गिर खिलाकर जो भी वचन कहें उनमें प्रभु-प्रेम का ही कथन किया था । उन दंपति का प्रभु-प्रेम अपार था, उसको सब नहीं जान सकते किन्तु जो प्रभु-प्रेम में निमग्न हुआ है वही जान सकता है ।
(क्रमशः)

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