गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

*११. भगति संजीवनी कौ अंग ~ १/४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*११. भगति संजीवनी कौ अंग ~ १/४*
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सब१ थैं ठीक हरि भगति है, रांम नांम सिधि जोग ।
कहि जगजीवन आंन क्रित, सुरग म्रित्यु सब भोग१ ॥१॥
१-१ नाम साधना के लिये सर्वोत्तम उपाय हरिभक्ति ही है । अन्य देवताओं की भक्ति तो केवल स्वर्ग, नरक या विविध भोगविलासों के जंजाल में ही फँसाये रखती है ॥१॥
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अनंत२ कोटि ब्रह्मांड को, पावै बिभौ विलास ।
तउ रांम भगति सम ना तुलै, सु कहि जगजीवनदास२ ॥२॥
२-२. तुल० - श्रीदादूवाणी -
सब सुष सुरग पयाल के, तौल तराजू बाहि ।
हरि सुष एक पलक का, ता सम कह्या न जाहि ॥
संतजगजीवन जी कहते है कि अनंत कोटि ब्रह्मांड का सुख मिलने पर भी वह राम भक्ति जैसा नहीं है प्रभु भक्ति ही श्रेष्ठ है ।
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जगजीवन जहां ना रही, भगति करै ल्यौ लाइ ।
सकल सुरग के देवता, कोतिग देखैं आइ ॥३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं जहाँ प्रभु की भक्ति है पर लय नहीं है वहां के कौतुक देवता भी देखते हैं भक्ति में श्रद्धा व विश्वास का होना अति आवश्यक कहा गया है ।
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करम धरम कीजै सरम, ए सब भरम अचेत ।
जगजीवन हरि भगति बिन, फलै न फूलै खेत ॥४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि धर्म का खेत तो जब हमारे सारे कर्म धर्म अनुसार व मर्यादित होगें तभी फलेगा । अतः हे जीव अन्य किसी भी भ्रम में मत रहना ।
(क्रमशः)

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