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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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२१. परिचय करुणा विनती । दादरा ~
राम ! सुनहुन विपति हमारी हो,
तेरी मूरति की बलिहारी हो ॥टेक॥
मैं जु चरण चित चाहना,
तुम सेवक - सा धारना ॥१॥
तेरे दिन प्रति चरण दिखावना,
कर दया अंतर आवना ॥२॥
जन दादू विपति सुनावना,
तुम गोविन्द तपत बुझावना ॥३॥
टीका ~ हे राम जी ! आप हमारी विरह की आवाज की सुनते हो न ? हम आपकी व्यापक मूर्ति की बारम्बार बलिहारी जाते हैं ।
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हम विरहीजनों के चित्त में आपके चरणों की चाहना है मुझे आप अपना साधारण - सा सेवक धारणा यानी समझना, क्योंकि आप अपने विरहीजन सेवकों को साधारणरूप से ही प्राप्त होते हो ।
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हे नाथ ! आप अपने तेज पुंज के चरणों का प्रति दिन दर्शन दीजिये । हे राम जी ! आप दया करके हमारे हृदय में आपके दर्शन दीजिये ।
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हे गोविन्द ! आप अपने विरहीजन भक्तों के अन्दर विरहाग्नि की तपत को दर्शन देकर बुझाने वाले हो ।
(क्रमशः)

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