गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

= “द्वि विं. त.” २४/२५ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“द्विविंशति तरंग” ४/२५)*
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*गरीबदास जी के वास्ते गंगा प्रकट की -* 
दास गरीबहिं प्यास लगी अति, 
न्हावन को मानस अकुलाये ।
दादु दयालु कमण्डलु सें, 
जलधार बहावन निर्झर भाये ।
पीवत न्हावत तृप्त भयो शिष, 
गुप्त किये पुनि धार लुपाये ।
निर्झर लागि शिकार करें जन, 
जीवहिं हिंसन दूर कराये ॥२४॥ 
तपोवन कन्दरा में घूमते हुये गरीबदास जी को तीव्र प्यास लगी । ऊष्मा से व्याकुल होकर नहाने की भी इच्छा हुई । तब दयालु गुरुदेव ने अपने कमण्डलु से जलधारा बहाकर निर्झर प्रकट कर दिया । जल पीकर और नहाकर जब गरीबदास जी तृप्त हो गये, तब समर्थ गुरुदेव ने उस निर्झर धारा को लुप्त कर दिया । क्योंकि निर्झर धारा से आकर्षित अनेक वन्य जीव वहाँ आते, और शिकारी लोगों द्वारा हिंसा होती रहती । इस पाप - निवृत्ति के लिये जलधारा लुप्त कर दी गई । गरीबदास जी ने प्रार्थना की गुरुदेव धारा बहती रहती तो अच्छा था, आपकी तपो भूमि का जल भक्तों के लिये गंगा जल समान, लोगों को पवित्र करने वाला होता, तब गरीब दास जी के अरज करने पर, वह धारा तीन कोष दूर महला साईड में पुराना नाम गरीब गंगा और चरखा के नाम से प्रसिद्ध, अब वह पानी लुप्त हो गया ॥२४॥ 
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*श्री भैराणा परबत तपोबन बताया -* 
दिव्य तपोवन शिष्य दिखावत, 
वापिस धाम नरायण आये ।
बात सुनी जन देश दिशा सब, 
आवत हैं गुरु दर्श लुभाये ।
आय जुड़े सब शिष्य समाज हु, 
भाव धरें गुरु भक्ति बधाये ।
श्री गुरुदेव धरे उपदेश जु, 
आयस दी सबही सुख पाये ॥२५॥ 
शिष्य गरीबदास जी को दिव्य तपोवन दिखाकर गुरुदेव पुन: नाराणपुर स्थित ब्रह्म धाम में पधार आये । गुरुदेव की अवशिष्ट अल्प समय निवास के बारे में सुनकर देश - दिशाओं से भक्त - जन दर्शनार्थ आने लगे । श्री दादूजी के शिष्यों ने जहाँ भी सुना, तुरन्त नारायण धाम पर पहुँचे, और श्रद्धाभाव से गुरुचरणों में शीश निवाया । गुरुदेव ने भी ज्ञानोपदेश देकर सभी को संतुष्ट किया ॥२५॥ 
(क्रमशः)

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