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*दादू भीतर द्वन्दर भर रहे, तिनको मारैं नांहि ।*
*साहिब की अरवाह हैं, ताको मारन जांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साँच का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*बैठ इकान्त कही सुत बात,*
*करी अति भ्रांति सु पत्र दिखायो ।*
*बाँचत आप हि को धिरकारत,*
*रांड सुता परि मारन भायो ॥*
*नीच बुलाय कही मठ जा करि,*
*आवत ता नर मारि सुहायो ।*
*चन्दरहास करो तुम पूजन,*
*है कुल-मात सदा चलि आयो ॥६३॥*
फिर एकान्त स्थान में बैठकर अपने पुत्र मदन को अपने मन की बात कही-तुमने बड़ा अज्ञान का काम किया है, मैंने तो इसको विष देने को लिखा था और तुमने इसका विवाह कर दिया है । तब मदन ने वह पत्र दिखाया । उसे पढ़कर धृष्टबुद्धि ने अपने को ही धिक्कारा, कारण उसमें तो विषया देना ही लिखा था । फिर भी धृष्टबुद्धि के मन ने चाहा- चाहे पुत्री विधवा हो जाय किन्तु इसको तो मारना ही है ।
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उसने व्याध को बुलाकर कहा- नगर के बाहर पहाड़ी पर जो देवी का मन्दिर है उसमें जाओ और सायंकाल अमुक समय पूजा करने आय उसे मार देना, यही मेरा प्रिय कार्य है । उधर चन्द्रहास को कहा- हमारी कुल देवी है, सायंकाल जाकर उसका तुम पूजन करो, इस प्रकार और उस समय देवी का पूजन करना हमारे कुल में सदा से चला आ रहा है ।
(क्रमशः)

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