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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“षष्टमोल्लास” ७९/८१)
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*दादूजी की योग शक्ति से झारी प्रगटी*
*आरणि महिं सूं निकसे आई,*
*पर दु:खे संतों दुख दाई ।*
*हुकम सक्ति करि लीनी झारी,*
*कृपा जल है तास मंझारी ॥७९॥*
संत पर दु:ख से स्वयं दुखी हो जाते हैं अत: शीघ्र ही वन से निकल कर राणियों वाले स्थान पर आ गये । दादूजी महाराज ने अपनी योग शक्ति को आज्ञा दी जिससे एक झारी वहां प्रकट हुई जिसके अन्दर स्वामी दूदजी की कृपा का जल भरा था ॥७९॥
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*दादूजी ने छीटा दिया राणियां जीवित हो गई*
*दई बौंक सोवत सी जागी,*
*निश्चल भई चंचलाई भागी ।*
*विसरि गई सबे घरबारू,*
*देह विदेह न रहीं संभारू ॥८०॥*
उस घट व झारी के कृपा जल का राणियों के मुख पर छींटा देते ही वे सब इस प्रकार उठ गईं जैसे चिर निद्रा से जागी हो । वे सब जीवित हो गई एवं बैठ गई । अब उनकी बुद्घि चंचलता को छोड़कर निश्चल हो गई और घर की बातें सब भूल गईं । देह की सुध नहीं रहने से विदेह सी हो गई थीं ॥८०॥
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*राणियां सब दादू जी के चरणों में गिर गई*
*डंडवत करे वारणां लैहीं,*
*स्वामी चरणौं मस्तक दैहीं ।*
*चकवी जैसें क्रड़कूं रहै,*
*उलटि राणी इक ऐसे कहै ॥८१॥*
अब तो वे राणियां दंडवत प्रणाम करके स्वामी दादूजी के चरणों में अपने मस्तक रख रख कर दादूजी पर अपने मन से निछावर हो रही थी । फिर एक राणी, जैसे रात्रि के समय चकवी चकवे से मुख मोड लेती है वैसे स्वामी दादूजी से अज्ञान रात्रि के कारण इस प्रकार बोली ॥८१॥
(क्रमशः)

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