रविवार, 27 दिसंबर 2020

शूरातन का अंग २४ - ५९/६२

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ शूरातन का अंग २४ - ५९/६२)
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*दादू मरबो एक जु बार, अमर झुकेड़े मारिये ।*
*तो तिरिये संसार, आतम कारज सारिये ॥५९॥*
*दादू जे तूं प्यासा प्रेम का, तो जीवन की क्या आस ।*
*शिर के साटे पाइये, तो भर भर पीवै दास ॥६०॥*
यदि तुझे भगवान् को देखने की प्यास है तो जीते हुए ही अहंकार को त्याग कर मर जावो । क्योंकि अहंकार ही भगवान् के दर्शनों में प्रतिबन्धक है । अतः बार-बार विचार करो । तुम जो भगवान् के दर्शनों में बाधा करता है ऐसे अहंकार को कैसे नहीं त्यागते । अहंकार के नाश से ही अमरत्व की प्राप्ति होगी । अतः साधक भगवद् रस को पीने के लिये अहंकार को त्याग कर शमदमादि साधन से ब्रह्म भाव को प्राप्त कर के संसार से पार हो जावें । विवेकचूडामणि में- अहंकार का मूल कारण अज्ञान है । मूल सहित अहंकार के नाश होने पर भी यदि फिर अहंकार पैदा हो जायेगा तो यह चित्त में सैकड़ों विक्षेपों को पैदा करके उसको चंचल बना देगा । जैसे वर्षा ऋतु में बादल पानी ही पानी कर देता है । अतः चित्त में क्षण भर भी अहंकार को मत रहने दो । 
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*॥ काइर ॥*
*मन मनसा जीते नहीं, पंच न जीते प्राण ।*
*दादू रिपु जीते नहीं, कहैं हम शूर सुजान ॥६१॥*
*मन मनसा मारे नहीं, काया मारण जांहि ।*
*दादू बांबी मारिये, सर्प मरै क्यों मांहि ॥६२॥*
यह कैसी शूरवीरता हुई ? जिससे न मन मर न इन्द्रियां ही जीती गई, न प्राण पर विजय हुई । केवल शरीर शोषण से मन नहीं मरता । जैसे बांबी के मारने से सर्प नहीं मरता । अतः मन को मारना ही शूरवीरता है । मन के मरने से सब कुछ जीता जाता है । योग वासिष्ठ में जीते हुए मन का स्वरूप बतलाया है कि- वह शान्त स्वच्छ और भ्रमरहित तथा इच्छा रहित हो जाता है । ऐसे मन में किसी भी अभीष्ट पदार्थ की इच्छा नहीं होती है और न किसी का त्याग ही होता । 
(क्रमशः)

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