मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

शूरातन का अंग २४ - ४३/४५

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ शूरातन का अंग २४ - ४३/४५)
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*अपने सांई कारणै, क्या क्या नहिं कीजे ?*
*दादू सब आरम्भ तज, अपणा शिर दीजे ॥४३॥*
प्रभु प्राप्ति के लिये भक्त को अशक्य से अशक्य भी कर्म करना चाहिये जैसे शिर का दान । अतः संपूर्ण आरम्भों को त्याग कर अपना शिर भगवान् को दान में दे देना चाहिये । शिर शब्द से अहंकार का बोध जानना । अर्थात् प्रायः सभी प्राणियों को अपना शरीर प्यारा होता है और शरीर के सभी अंगों में शिर सबसे अधिक प्रिय होता है । अतः उसके दान से यह भाव प्रकट होता है कि प्रभु को अपनी सबसे अधिक प्रिय वस्तु देनी चाहिये क्योंकि उसी से प्रभु को प्रसन्नता होगी । अथवा शिर प्रायः किसी को नमता नहीं क्योंकि जीव अहंकारी होता है । अतः शिर का लाक्षणिक अर्थ अहंकार है । वह भगवान् को देने से जीव भाव समाप्त हो जायेगा और ब्रह्म भाव को प्राप्त हो जायेगा ।
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*शिर के साटै लीजिये, साहिब जी का नांव ।*
*खेलै शीश उतार कर, दादू मैं बलि जांव ॥४४॥*
*खेलै शीश उतार कर, अधर एक सौं आइ ।*
*दादू पावै प्रेम रस, सुख में रहै समाइ ॥४५॥*
हरिभक्ति बहुत दुर्लभ है । शिर का दान करने पर भी मिले या नहीं और शिर का दान भी बहुत दुर्लभ है । इसलिये दुर्लभ शिर का दान करके दुर्लभ भक्ति को प्राप्त कर लेना चाहिये । जो भगवान् को शिर का दान करके बार-बार भगवान् का ध्यान करते हुए भक्ति रस को पीते हैं, मैं उनकी बलिहारी ले रहा हूँ । अथवा शिर का अर्थ अहंकार समझना । अहंकार के त्यागने से ही हरि मिलते हैं । विवेकचूडामणि में- यह अहंकार हमारा परम शत्रु है, जो गले में काटें की तरह दुःख दे रहा है इस अहंकार को ज्ञान रूपी तलवार से काटकर भगवान् को अर्पण करके आत्मा के साम्राज्य सुख का यथेष्ट भोग करो ।
(क्रमशः)

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