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*दादू जब लग जीविये, सुमिरण संगति साध ।*
*दादू साधू राम बिन, दूजा सब अपराध ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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दूसरे दिन सुबह को बगीचे में खड़े हुए श्रीरामकृष्ण वार्तालाप कर रहे हैं । मणि कहते हैं, “तो मैं यहाँ आकर रहूँगा ।”
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, तुम लोग जो इतना आया करते हो, इसके क्या मानी है ? साधु को लोग ज्यादा से ज्यादा एक बार आकर देख जाते हैं । तुम इतना आते हो – इसके क्या मानी है ?
मणि तो चकित हो गये । श्रीरामकृष्ण स्वयं ही इस प्रश्न का उत्तर देने लगे ।
श्रीरामकृष्ण(मणि से) – अन्तरंग न होते तो क्या आते ? अन्तरंग अर्थात् आत्मीय, अपना आदमी – जैसे पिता, पुत्र, भाई, बहन । सब बातें मैं नहीं कहता । नहीं तो फिर क्यों आओगे ?
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“शुकदेव ब्रह्मज्ञान पाने के लिए जनक के पास गए थे । जनक ने कहा, ‘पहले दक्षिणा दो ।’ शुकदेव ने कहा, ‘जब तक उपदेश नहीं मिल जाता, तब तक कैसे दक्षिणा दूँ ? जनक ने हँसते हुए कहा, तुम्हें ब्रह्मज्ञान हो जाने पर फिर गुरु और शिष्य का भेद थोड़े ही रह जाएगा ? इसीलिए हमने पहले दक्षिणा की बात कही’ ।”
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(४)
*सेवक की विचार तरंगें*
शुक्लपक्ष है । चाँद निकला है । मणि कालीमन्दिर के उद्यान के रास्ते पर टहल रहे हैं । रास्ते के एक ओर श्रीरामकृष्ण का कमरा, नौबतखाना, बकुलतला और पंचवटी है – दूसरी ओर ज्योत्स्नापूर्ण भागीरथी बह रही हैं ।
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मणि मन ही मन कह रहे हैं – “क्या सचमुच ही ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं ? श्रीरामकृष्ण तो ऐसा कहते हैं । उन्होंने कहा कि थोड़ी साधना करते ही कोई आकर बता देगा, ‘ऐसा ऐसा करो ।’ अर्थात् उन्होंने थोड़ी साधना करने के लिए कहा । अच्छा, मेरा तो विवाह हो चुका है, लड़के-बच्चे भी हुए हैं क्या इतने पर भी ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है ? (थोड़ा सोचकर) अवश्य ही किया जा सकता है, नहीं तो ये वैसा क्यों कहते ? उनकी कृपा होने से क्यों न होगा ?
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“सामने यह जगत् दिखायी दे रहा है – ये सूर्य, चन्द्र, तारे, जीव, चौबीस तत्त्व – ये सब कैसे उत्पन्न हुए, इनका करतार कौन है, मैं, उनका कौन हूँ, यह न जानने पर जीवन ही व्यर्थ है ।
“श्रीरामकृष्ण पुरुषश्रेष्ठ हैं । ऐसे महापुरुष मैंने जीवन में आज तक नहीं देखे । इन्होंने अवश्य ही ईश्वर को देखा है । अन्यथा, ये ‘माँ माँ’ कहते हुए दिनरात किसके साथ बातचीत करते रहते हैं ! अन्यथा, ईश्वर पर इनका इतना प्रेम कैसे हो सकता है ! इतना प्रेम कि एकदम बाह्यज्ञानरहित हो जाते हैं ! समाधिमग्न जड़वत् हो जाते हैं ! फिर कभी प्रेम में मतवाले होकर हँसते, रोते नाचते और गाते हैं ।”
(क्रमशः)

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